बस्ती। जो पत्रकार एसओ और चौकी इंचार्ज के तबादले पर माला पहनाने के लिए भागे-भागे थाना और चौकी चले जाते हैं, और सोशल मीडिया पर फोटो को वायरल करना नहीं भूलते, उन पत्रकारों से जनता जानना और कहना चाहती हैं, कि क्यों आप लोग माला पहनाने वाले पत्रकार ही बनते? क्यों नहीं इस लायक बनते कि लोग आप लोगों को माला पहनाए? क्यों आप लोग पुलिस वालों के हीरो बनते? क्यों नहीं पीड़ितांे के हीरो बनते? सवाल तो उन लोगों के लिए चुभने वाला है, जो अपनी पत्रकारिता थानों और चौकियों तक ही सीमित रखते है। ऐसे पत्रकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज उन्हें देख रहा है, और उनके कार्यो की समीक्षा भी कर रहा है। टिनीच चौकी इंजार्च के तबादले के बाद चौकी पर जो देखा गया, उसे कोई भी सही और अच्छा नहीं मान रहा है। प्रधान और कथित जिला पंचायत सदस्य अगर माला लेकर खड़े रहेगें तो बात समझ में आती, लेकिन अगर पत्रकार यह काम करें, तो सवाल तो उठेगा ही। अगर यह वायरल नहीं होता तो बात छिपी रहती, लेकिन वायरल करने वाली मंषा षायद वफादारी दिखाने की रही हो। इसी को देखकर ही कहा जा रहा है, कि पत्रकारों को माला पहनाने वाला नहीं बल्कि पहनने वाला होना चाहिए।

लोगों को आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर एसओ और चौकी इंचार्ज को माला पहनाकर पत्रकार क्या साबित करना और दिखाना चाहते है? एक तो माला पहनाकर अपनी बदनामी करवा रहे हैं, दूसरा रही सही कसर फोटो को वायरल कर पूरा कर दे रहे है। माला पहनाने से पहले पत्रकारों को उन पीड़ितों को याद कर लेना चाहिए, जिसे थानों और चौकी से न्याय नहीं मिलता, न्याय देने को कौन कहे, डांटडपट कर भगा दिया जाता हैं, इसके बाद भी अगर कोई पत्रकार किसी एसओ और चौकी इंचार्ज को माला पहनाकर उनका गुणगान करता है, तो उसे अनेक सवालों से गुजरना पड़ेगा। जो पत्रकार पीड़ितों को दुतकारने वाले को माला पहनाने में ही अपनी षान समझते हैं, तो उन्हें पत्रकारिता करने का कोई हक नहीं। ईमानदारी से अगर वह खुद की समीक्षा करगें, तो उन्हें लगेगा कि माला पहनाकर उन्होंने पत्रकारिता को कलंकित किया है। इसी तरह जिले में अगर कोई बड़ा अधिकारी आता है, तो बुके ले जाने वाले पत्रकारों की लाइन लग जाती है। आखिर ऐसे पत्रकार अपने आप को क्या साबित करना और दिखाना चाहते है? क्यों यह लोग अपने आप को यह बताने के लिए स्वागत करने चले जाते हैं, कि उनसे बड़ा कोई पत्रकार नहीं है। एक पत्रकार का यह काम नहीं हैं, और न जनता पत्रकारों से यह अपेक्षा रखती है। जिस तरह स्वागत करने में होड़ लगी रहती है, ठीक वही होड़ बिदाई के समय में भी लगी रहती है। फिर वही सवाल घूम फिरकर आ रहा है, कि किसी अधिकारी ने आम जनता के लिए ऐसा कोई कार्य किया? जिसके लिए उनकी बिदाई फूलों से की जाए। डीएम रामेंद्र त्रिपाठी के बाद ऐसा कोई डीएम नहीं रहे, जिन्हें जनता और मीडिया ने कार्यक्रम आयोजित कर सम्मानित किया। हर वर्ग के लोगों ने उनका सम्मान किया, एक सप्ताह तक उनका सम्मान समारोह होता रहा। जितना मान-सम्मान उन्होंने मीडिया को दिया और गरीबों की मदद की, उतना षायद ही किसी डीएम ने किया होगा। एक बार एक पत्रकार ने डीएम से कहा कि सर एक ऐसा दलित परिवार है, जिसके पास न तो रहने को घर हैं, और न शोचालय, घर की बेटियों और महिलाओं को षौच करने के लिए अमहट जाना पड़ता। उस समय शोचालय और आवास की कोई योजना नहीं थी। उन्होंने कहा कि ऐसा करो एक प्रार्थना पत्र लेकर आओ जिसमें मदद की बात कही गई हो, सबसे पहले डीएम ने उस मदद वाले पत्र पर पांच हजार लिखा और दिया भी, जानकर हैरानी होगी कि डीएम ने अन्य अधिकारियों से मदद के लिए कहा, नतीजा इतना पैसा एकत्रित हो गया, कि उस पैसे से दलित परिवार का घर और शोचालय दोनों बन गया। अगर ऐसे अधिकारी का सम्मान मीडिया और समाज के लोग करते हैं, तो बात समझ में आती है, लेकिन अगर वहीं पर मीडिया ऐसे अधिकारियों का सम्मान समारोह आयोजित करती हैं, जिसने पूरे कार्यकाल में एक बार भी पीसी न किया हो और जिसने पढ़ने लिखने वाले पत्रकारों का सम्मान न किया हो, तो समझ में नहीं आता। व्यक्तिगत संबध किसी से भी हो सकते हैं, लेकिन कोई भी समझदार व्यक्ति अपने व्यक्तिगत संबधों को सार्वजनिक नहीं करता। वही लोग सार्वजनिक करते हैं, जो लाभान्वित हुए होगें, और भविष्य लाभान्वित होने की आशा रखते हों। अगर कोई पत्रकार लाभ के लिए माला पहनाते हैं, तो समझो वह पत्रकार नहीं हो सकता है। क्यों कि कोई भी पत्रकार, माला पहनाकर पत्रकारिता की गरिमा को गिराना नहीं चाहेगा। अगर कोई गिराता है, तो ऐसे पत्रकार को समाज न जाने किस-किस नाम से पुकारता है।