बस्ती। 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल में सरकारी लैब ‘पीओ सिटी’ के रहते प्राइवेट लैब ‘पीओसीएल’ स्थापित करने और उसे 89 लाख का भुगतान करने के मामले में सीएमएस सुषमा जायसवाल फंसती नजर आ रही है। मैडम से सवाल पूछे जा रहे हैं, कि मैडम, जब अस्पताल में सरकार की ओर से लैब की मषीन लगी हुई है, आपरेट करने के लिए सरकार ने मैनपावर फ्री में दे रखा हैं, तो फिर आपने कैसे और क्यों प्राइवेट लैब का संचालन करने की अनुमति दे दी? जब कि मरीज कम होने के नाते किसी अन्य लैब की आवष्यकता नहीं बताया जा चुका। क्या पीओसीएल लैब को अनुमति देने से पहले सरकार या विभाग से अनुमति ली गई? इन सबसे बड़ा सवाल यह पूछा जा रहा है, कि कि क्यों नहीं महिला अस्पताल में अल्टासाउंड और एक्सरे मशीन खरीदी गई, जबकि सबसे अधिक आवष्यकता इन्हीं दोनों मशीनों की है? मरीज को बाहर से जांच करवाना पड़ता, जिसके चलते हजारों रुपया खर्च करना पड़ता। क्यों फर्जी तरीके से कमीशन के लालच में पीओसीएल लैब के शुभग अग्रवाल को 89 लाख का भुगतान कर दिया? इस भुगतान के एवज में कितना कमीशन मिला? इतना ही नहीं मैडम से यह भी पूछा जा रहा है, कि मैडम जब अस्पताल में वाहन नहीं तो चालक शुभम शुक्ल की क्या आवष्यकता? और क्यों उसका भुगतान डूडा को किया जा रहा है? जब आवष्यकता नहीं है, तो क्यों नहीं वाहन चालक को वापस कर दिया जा रहा? क्यों डूडा से लिए गए मैनपावर को उनके पद के अनुसार काम नहीं लिया जा रहा है? पूछा गया कि जब बाबू का तीन पद ही स्वीकृति हैं, और तीनों कार्यरत हैं, तो फिर क्यों चौथे बाबू यानि सुनील प्रधान को जिला महिला अस्पताल से यहां पर नियम विरुद्ध अटैच करवाया गया? और क्यों उन्हें नियम विरुद्व सरकारी आवास आवंटित किया गया? जबकि यह बस्ती से वेतन ले रहे हैं। क्यों फार्मासिस्ट राम मणि षुक्ल दवा काउंटर पर मरीजों को देख रहें है, और उन्हें दवा भी लिख रहें हैं? क्यों नहीं दो बजे के बाद पैरामेडिकल और डाक्टर अस्पताल में मिलते? और क्यों मेल और फिमेल स्टाफ स्टाफ नर्स और सुरक्षा कर्मी ही मिलतें हैं?
विभाग ने जिन उम्मीदों और भरोसे के साथ सीएमएस डा. सुषमा जायसवाल को 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल को सौंपा उस पर मैडम खरा नहीं उतरी। यह न तो गरीब मरीजों के लिए भगवान बन पाई और न सरकार की नजर में ही एक अच्छा प्रशासक ही साबित हुई, नेताओं, पत्रकारों और शुभग अग्रवाल जैसे भ्रष्ट लोगों की चहेती अवष्य बनी।
जिस सीएमएस के तीन साल के कार्यकाल में सरकारी धन का दुरुपयोग और गरीब मरीजों का षोषण और उत्पीड़न हुआ हो, वह कैसे एक आइडिएल सीएमएस बन सकती? इनके कार्यकाल में लिपिक बजंरग प्रसाद और फार्मासिस्ट राम मणि शुक्ल जैसे अन्य लोगों ने मलाई काटने के आलावा और कुछ नहीं किया। न डाक्टर समय से आते हैं, और न समय से जाते हैं, अगर किसी को रात बिरात एमरजेंसी पड़ गई, तो ढ़ूढने पर भी डाक्टर नहीं मिलेगें। इस अस्पताल में सबसे अधिक ख्याल स्थानीय पत्रकारों का रखा जाता हैं
, एक मरीज से अधिक उनकी सेवा की जाती है, और पत्रकार लोग भी सीएमएस की सेवा से खुश रहते है। तभी तो यहां के पत्रकार को अस्पताल की कोई कमी नजर नहीं आती। देखा जाए तो सीएमएस के तीन साल के कार्यकाल में उपलब्धियां कम और अनियमितता अधिक हुई। इन्होंने भ्रष्टाचार में जितना नाम कमाया, उतना सेवा में नहीं।
जिस महिला सीएमएस को मरीज और विभाग के लिए आईडिएल बनना चाहिए, वह भ्रष्टाचारी बन गई। अगर नहीं बनी होती तो इस अस्पताल को बजरंग प्रसाद जैसा भ्रष्ट बाबू न चलाता, और न पीओसीएल लैब का शुभग अग्रवाल ही इतना बड़े घोटाले का सूत्रधार बनता। एक बात तो तय हैं, कि अस्पमाल के उच्चीकरण और प्राइवेट लैब के मामले में मैडम की जब हर्रैया से बिदाई और कार्रवाई होगी, तो यह हर्रैेया को कभी नहीं भूल पाएगीं। इनके जाने के बाद भले ही कोई रोए या न रोए, लेकिन बजरंग प्रसाद और शुभग अग्रवाल जैसे लोग अवष्य आंसू बहाएगें।
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