-लड़की ने कहा कि जब मेरे माता पिता को लोग मार डालेगें तब आप मुकदमा लिखेगें, रोती हुई कही कि मुकदमा लिखने का कितना पैसा चाहिए
बस्ती। सवाल उठ रहा है, कि सुसाइड करने वाली नाबालिग लड़कियां लालगंज थाने की पुलिस पर ही क्यों सुसाइड करने का जिम्मेदार मानकर बार-बार आरोप लगाती? पहले बलात्कार के आरोपियों के खिलाफ मुकदमा न दर्ज करने का आरोप लगाते हुए भरवलिया की 15 साल की लड़की ने सुसाइड कर लिया। अब ग्राम पसड़ा की नाबालिग लड़की प्रीति ने एसओ पर सुसाइड करने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाया। लड़की का कहना है, कि गांव के प्रदीप, प्रकाश,, विजय, रंजीत ने मिलकर पुरानी रंजिश में माता और पिता शिवकुमार को 18 फरवरी 26 को हत्या करने की नीयत से मार-मार अधमरा कर दिया, विकलांग बहन पूजा को भी मारा-पीटा, 108 आई और ले जाकर घायलों का इलाज सरकारी अस्पताल में करवाय। डाकटरी मुआयना भी करवाया, कहा कि एसओ से बार-बार कहने के बाद भी आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया, जब कि गांव वाले पुलिस के सामने मारने-पीटने का बयान भी दे चुके हैं। सोमवार को लड़की ने अधिवक्ता के चेंबर में रो-रोकर एसओ को उनके सीयूजी नंबर पर फोन करके कहा कि एसओ साहब मैं सुसाइड करने जा रही हूं, यह भी कहा कि मेरे माता-पिता और विकलांग बहन को बदमाशों ने जान लेने की नीयत से अधमरा कर दिया, और आप ने रिपोर्ट तक नहीं लिखा, कहा कि कई बार मुकदमा दर्ज करने की अपील कर चुकी हूं, क्या आप मेरे माता-पिता और बहन की जान जाने के बाद मुकदमा दर्ज करेगें, कहा कि मुकदमा दर्ज करने के लिए कितना पैसा आप को चाहिए। बताइए। लड़की ने तीन चार बार फोन करके कहा कि एसओ साहब मैं अमहट में कूदकर जान देने जा रही है, क्यों कि मैं अपने परिवार को मरता हुआ नहीं देख सकती, इस लिए मैं खुद मरने जा रही, कहा कि मैं लिखकर जाउंगी कि मेरे मौत के जिम्मेदार एसओ लालगंज संजय कुमार है। एसओ लालगंज से तंग आकर लड़की डीआईजी से भी मिल चुकी। क्षेत्र के और जिले के मीडिया ने देख चुकी है, कि लालगंज पुलिस ने भरवलिया की लड़की के सुसाइड के मामले में कब मुकदमा दर्ज किया? लालगंज की पुलिस कभी न मुकदमा दर्ज करती अगर नवागत एसपी के सामने मीडिया इस मामले में सवाल न खड़ा करता। थाने ने मुकदमा भी लिखा और रातों-रात बलात्कार और सुसाइड के आरोपी शक्तिमान को गिरफतार कर जेल भी दिया, यही तेजी अगर एक माह पहले लालगंज की पुलिस ने दिखाई होती तो 15 साल की लड़की सुसाइड न करती। दोनों परिवार के लोगों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि पुलिस ने जितना चाहा आरोपी का दोहन किया, कहते हैं, कि पुलिस के लिए जब पैसा ही सबकुछ हो जाएगा तो चाहे कोई सुसाइड करें या चाहें कोई मरे जिए, पुलिस से कोई मतलब नहीं। भरवलिया और पसड़ा के मामले में पीड़ित परिवार की कानूनी मदद करने वाले डीजीसी क्रिमिनल दुर्गा प्रसाद उपाध्याय का कहना है, कि लालगंज थाने की पुलिस दोनों मामलों में मनमानी कर रही है, पीड़ितों को न्याय दिलाने के बजाए उन्हें अपने तरीके से परेशान करती है। कहते हैं, कि पुलिस के इसी रर्वैये के चलते सरकार की छवि तो खराब हो ही रही है, साथ ही समाज में पुलिस को लेकर गलत संदेष भी जा रहा है। कहते हैं, कि एसओ का यह कहना कि भरवलिया के मामले में लड़की के सुसाइड करने के वक्त आरोपी शक्तिमान गांव में था ही नहीं, कहते हैं, कि एसओ साहब को यह नहीं मालूम कि यह हत्या का मामला नहीं हैं, बल्कि सुसाइड का मामला है। आरोपी मौके पर रहे या न रहे, इससे क्या फर्क पड़ता। कहते हैं, कि बिना केस दर्ज के पुलिस कोई नतीजे पर पहुंच ही नहीं सकती, और जब पुलिस ने केस ही दर्ज नहीं किया तो पीड़ित को न्याय कैसे मिलेगा? कहते हैं, कि इसी तरह पुलिस पसड़ा के मामले में भी लापरवाही बरत रही है, अगर लड़की ने वाकई सुसाइड कर लिया तो लालगंज पुलिस पर भी कानूनी कार्रवाई की आंच आ सकती है।
‘उत्पीड़न’ से ‘तंग’ एक और ‘गुरुजी’ ने दी ‘जान’
बस्ती। चार दिन पहले एमएलसी देवेद्र प्रताप सिंह ने सदन में षिक्षा विभाग के भ्रष्टाचार की पोल खोलते हुए खलबली मचा दी थी। एमएलसी साहब का सच देवरिया के बीएसए में तैनात गोरखपुर- सहाबाजगंज निवासी कृष्ण मोहन सिंह ने सुसाइड करते हुए लिखा कि “मैं मरना नहीं चाहता था, मैं अपने बच्चों के लिए जीना चाहता था, लेकिन मुझे मरने के लिए मजबूर कर दिया गया”। कहा भी जाता है, कि सरकारी व्यवस्था और सूदखोरों में कोई अंतर नहीं दिख रहा। कृष्ण मोहन सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे ,एक शिक्षक जो बच्चों को उज्ज्वल भविष्य का रास्ता दिखाता था, आज खुद अपने ही जीवन की लड़ाई हार गया, देवरिया से जुड़े इस शिक्षक ने गोरखपुर में अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली, लेकिन जाने से पहले एक वीडियो और शब्दों में अपना दर्द छोड़ गए “मैं मरना नहीं चाहता था३ मैं अपने बच्चों के लिए जीना चाहता था३ लेकिन मुझे मजबूर कर दिया गया”
सोचिए, उस पिता के दिल पर क्या बीती होगी, जब पत्नी के गहने गिरवी रखने पड़े होंगे, बैंक से कर्ज लेना पड़ा होगा, हर दिन उम्मीद की होगी कि अब सब ठीक होगा। लेकिन जब मेहनत की कमाई भी बेबसी हो जाए, जब इंसान न्याय के लिए दर-दर भटके, जब सम्मान बार-बार ठुकराया जाए तो दिल टूटता नहीं, बिखर जाता है। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने 16 लाखों रुपये की मांग और मानसिक दबाव का जिक्र किया, अपनी इज्जत, अपना घर, अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया फिर भी उन्हें सिर्फ इंतजार और अपमान मिला,
सबसे बड़ा सवाल व्यवस्था पर है। बीएसए कार्यालय के ‘सिस्टम’ की संवेदनहीनता ने एक शिक्षक की जान ले ली, आज एक पत्नी की दुनिया उजड़ गई, बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया३ एक परिवार की रोशनी बुझ गई। एक शिक्षक चला गया, पर व्यवस्था पर सवाल छोड़ गया, क्या हालात इतने कठोर हो सकते हैं कि एक ईमानदार इंसान की जीने की उम्मीद ही छीन लें?
0 Comment