-इन दोनों विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और जनविरोधी कार्य को देखते हुए लगता ही नहीं कि इन विभागों के मुखिया डीएम और एसपी

-दोनों विभागों के मुखिया डेली कार्यो की समीक्षा करते, लेकिन व्याप्त भ्रष्टाचार की समीक्षा न जाने क्यों नहीं करते?

बस्ती। जिले की जनता सूबे के मुखिया से सवाल कर रही है, कि बताइए ‘भैंस’ और ‘केले’ के एक पेड़ की चोरी का मुकदमा जरुरी या फिर रेप का। यह भी सवाल कर रही है, जब भैंस की चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है, तो रेप का क्यों नहीं? शायद इसका जबाव योगीजी के पास नहीं, अगर होता तो भैंस की चोरी का मुकदमा नहीं बल्कि रेप का दर्ज होता। कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मामले में योगी की सरकार जनता के सवालों से पूरी तरह घिरी हुई है। अब तो इनके जनप्रतिनिधि ही सदन में भ्रष्टाचार की पोल खोलने लगें है। हालत यह हो गई कि अब सरकार का कोई प्रतिनिधि जनता और मीडिया के सवालों का सामना तक नहीं कर पा रहा है, जबाव न देना पड़े, इस लिए कन्नी काट ले रहे है। अब जिले में कोई नेता भ्रष्टाचार और विकास को लेकर प्रेसवार्ता नहीं करता। राजधानी से आए हुए नेता कार्यक्रमों तक ही सिमट के रह जाते हैं, वे कब आते हैं, और कब जातें, जनता और मीडिया तक को पता नहीं चलता। गांव के विकास की तो यह बात करते हैं, लेकिन गांव वालों के पास नहीं जाते। लगभग तीन साल हो गए, एक भी जिले के मुखिया ने पीसी नहीं किया। मंडल के मुखिया की तो बात ही छोड़िए। कहा भी जाता है, जो डीएम तहसीलों और एसपी थानों को भ्रष्टाचारमुक्त न कर सके, उससे जनता क्या उम्मीद करें? ऐसा लगता है, कि मानों एसडीएम और थानेदार डीएम और एसपी के हाथ से निकल चुके है। अगर अधिकारी यह समझते हैं, कि समीक्षा बैठक के जरिए भ्रष्टाचार को मिटाया और पीड़ितों को न्याय दिलाया जा सकता है, तो जिले की जनता सरकारी व्यवस्था से इतना नाराज और असंतुष्ट नहीं रहती।

योगीजी को यह नहीं भूलना चाहिए, इस नाराजगी का प्रभाव अधिकारियों पर तो नहीं बल्कि आप की सरकार और भाजपा पर पड़ सकता है। योगीजी और उनकी टीम को यह नहीं भूलना चाहिए कि सबसे अधिक सवाल उन तहसीलों और थानों के भ्रष्टाचार पर उठ रहे हैं, जहां से सरकारें बनती और बिगड़ती है। जिस तरह तहसीलों और थानों में फरियादियों और पीड़ितों का दोहन और षोषण हो रहा है, उसे देखते हुए गांव, गढ़ी, कस्बों और मोहल्लों के लोग कहने लगे कि बहुत अत्याचार, जुल्म और दोहन का दंश झेल चुके हैं, लेकिन अब नहीं। कहते हैं, कि जिस पार्टी की सरकार से सबसे अधिक जनता को उम्मीदें थी, उसी ने उन्हें छला और धोखा दिया। यह भी कहते हैं, कि वह इस धोखें का बदला अवष्य लेगें, 27 में दिखा देगें कि जनता के साथ धोखा देने का क्या परिणाम होता है? जनता अगर कुर्सी पर बैठा सकती है, तो उतार भी सकती है। जनता के गुस्से का सामना सबसे अधिक भाजपा के उम्मीदवारों को करना पड़ेगा। क्यों कि जनता की नाराजगी सिर्फ योगीजी से ही नहीं बल्कि उन जनप्रतिनिधियों से हैं, जिन्होंने जातिवाद की नफरत फैलाकर अपनी रोटी संेकी है। जिन्होंने सिर्फ निधि की नहीं बेचा बल्कि अन्य सरकारी योजनाओं में बखरा लिया। खुले आम जिस तरह भाजपा के नेताओं का जातिवाद फैलाने का आडियो वायरल हो रहा है, उसका खामियाजा तो उन्हें भुगतना ही पड़ेगा, भले ही ऐसे लोग चाहें दल बदल लें लेकिन जो ब्राहृमण और ठाकुर के बीच खाई पैदा कर रहे हैं, उनको तो उन लोगों का कोपभाजन बनना ही पड़ेगा, जिन्हें यह अपमानित कर रहे है। देखा जाए तो यही सब किसी नेता के हार का कारण बनता है। जो नेता जाति की बात करता है, वह कभी एक सफल नेता नहीं हो सकता, ऐसे लोग अपार अवैध संपत्ति के मालिक तो हो सकते हैं, लेकिन व्यक्तित्व के धनी नहीं हो सकते। जो लोग विषेष जाति को अपमानित और बुरा भला कहते हैं, क्या वह अपने सीने पर हाथ रखकर कह सकते हैं, कि जिस वर्ग को उन्होंने अपमानित और गाली दिया, उस वर्ग का एक भी वोट उन्हें मिला। जो नेता यह समझते हैं, कि वह तो ब्राृहमणों या फिर ठाकुरों के वोट से जीते हैं, वे अपने आप को धोखा तो दे ही रहे हैं, साथ ही उनको भी अपना दुष्मन बना रहे हैं, जिन्होंने जाने-अनजाने या फिर मोदी और योगी के चलते वोट दिया। अनेक जानकारों का कहना है, कि अगर नेतागण जातिवाद की बात करना और बढ़ावा देना बंद कर दे तो, समाज कभी नहीं बंटेगा। बहरहाल, जैसे-जैसे विधानसभा का चुनाव करीब आ रहा है, वैसे-वैसे अपने आपको खुदा समझने वाले नेताओं की पोल खुल रही है, और यह पोल कोई और नहीं बल्कि उनके अपने लोग ही खोल रहे है। हम बात कर रहे थे, कि पुलिस के लिए चोरी के भैंस का मुकदमा लिखना जरुरी है, या फिर रेप की पीड़िता का। लालगंज थाने ने रेप की पीड़िता का मुकदमा नहीं दर्ज किया, जिसके चलते 15 साल की लड़की को फंासी पर लटक कर अपनी जान देनी पड़ी। वहीं एक दिन पहले नगर थाने की पुलिस ने बैड़ारी एहतमाली मांझा के अनुज पासवान पुत्र अरविंद पासवान की तहरीर पर भैंस की चोरी और उसके मारे जाने की रिपोर्ट लिख देती है। वह भी अज्ञात। क्या यही बस्ती पुलिस की पहचान है।