बस्ती। कृषि विभाग प्रदेश का पहला ऐसा विभाग होगा, जहां पर सबकुछ बिकता, बस खरीदार चाहिए। यह वही विभाग हैं, जिसके मंत्री सूर्यप्रताप शाही को स्थानीय पत्रकार ने खुले आम कहा था, कि क्या तुम मंत्री बनने लायक हो। जिस विभाग के मंत्री को एक पत्रकार यह चैलेंज करे कि हिम्मत हो तो एफआईआर दर्ज करवाकर दिखाओ। उस विभाग के अधिकारी और बाबू अगर पटल बेंचते, वेतन बेचतें, कृषि यंत्र बेचते और जांच रिपोर्ट बेचते हैे, तो इसमें हैरान होने जैसी कोई बात नहीं है। जो मंत्री भ्रष्ट जेडीए, उप निदेशक कृषि और जिला कृषि अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाए, उन्हें खाद और कृषि यंत्रों में भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का मौका दें, उस विभाग को बर्बाद और गर्त में जाने से कौन बचा पाएगा? इस सवाल का जबाव योगीजी के पास भी नहीं होगा, क्यों कि इन पर भी भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने और बचानेे का आरोप लग रहें है। जिस विभाग के अधिकारी पैसे के लिए ईमान और धर्म तक बेचने को तैयार हो जाएं, उस विभाग में जांच रिपोर्ट को बेचने में कितना समय लगेगा?
वरिष्ठ लिपिक पुनीत पांडेय के स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति के मामले में तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी, डा. राजमंगल पांडेय को बचाने के लिए जेडीए से लेकर उप निदेशक कृषि नंगा हो चुके हैं, रिपोर्ट तक बदलने की चर्चा हो रही है। अंदरखाने की बातें अगर सही है, तो इस मामले में जो रिपोर्ट डीडी ने पहले बनाया था, और जिसमें सही रिपोर्ट लगाया गया था, और स्पष्ट कहा गया था, इस मामले में तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी ने अपने अधिकार के बाहर जाकर स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति का निर्णय लिया, और निर्णय लेने से पहले उच्चाधिकारियों के न तो संज्ञान में लाए और न स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति करने से पहले कोई नोटिस ही जारी किया। कहने का मतलब यह रिपोर्ट अगर निदेशालय को चली जाती तो डा. राजमंगल चौधरी के खिलाफ कार्रवाई तय था, और पुनीत पांडेय को सेवा में पुनः वापस लेने का आदेश भी जारी होता। अब सवाल उठ रहा है, कि जब यह रिपोर्ट गोपनीय थी, और जिसे जेडीए के बाबू को बंद लिफाफा में दिया गया, तो कैसे रिपोर्ट लीक हुई? और कैसे रिपोर्ट डा. राजमंगल चौधरी तक पहुंची? बताते हैं, कि रिपोर्ट लीक करने में जेडीए के बाबू का बहुत बड़ा हाथ है। इससे पहले भी इन पर कई गोपनीय पत्रावली और पत्र लीक किए जाने का आरोप लग चुका है। जाहिर सी बात है, जिस विभाग में सबकुछ बिकता हो, उस विभाग के जेडीए का बाबू अगर रिपोर्ट बेच भी दिया हो तो इसमें कोई अचरच की बात नहीं। जाहिर सी बात हैं, जब प्रभारी जिला कृषि अधिकारी को यह पता चला कि अगर यह रिपोर्ट शासन को चली गई, तो उनका सस्पेंशन तय है। बताते हैं, कि इसके बाद इन्होंने जेडीए के साथ मिलकर रिपोर्ट बदलवाया। डीडी साहब को यह नहीं मालूम कि रिपोर्ट बदलकर वह खुद संदेह के घेरें में आ गए है। क्यों कि शासन और विभाग, इस बात की जांच करने को कहा कि जो ‘स्वेच्छिक सेवा निवृत्ति तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी’ के द्वारा करने का निर्णय लिया, वह निर्णय सही है, या गलत। इसी सही और गलत की जांच करके रिपोर्ट देनी थी, लेकिन जिस तरह जेडीए, डीडी और तत्कालीन प्रभारी जिला कृषि अधिकारी ने मिलकर रिपोर्ट बदलवाने का खेल खेला, उसका खामियाजा आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। रिपोर्ट बदलने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि रिपोर्ट स्वेक्ष्छिक सेवा निवृत्ति के बारे में मांगी जा रही है, और डीडी साहब स्क्रिनिगं कमेटी के जरिए पुनीत पांडेय के खिलाफ अनुशासनिक कार्रवाई करने और अनिवार्य सेवा निवृत्ति करने के लिए स्क्रिनिगं कमेटी के पास भेजने की रिपोर्ट कर रहे है। जेडीए और डीडी कार्यालय का हर एक कर्मी कह रहा है, कि जांच रिपोर्ट बदली गई, और यह भी कह रहा है, कि जांच रिपोर्ट को किस बाबू ने लीक किया। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि जो जांच रिपोर्ट गोपनीय थी, उसे भेजने से पहले बेच दी गई। अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि इस विभाग में सबकुछ बिकता है, बस खरीदार चााहिए।
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