बस्ती। मीडिया और आम जनता उन नेताओं को चेतावनी और सलाह दे रही है, जो शागिर्द इस लिए बनाते हैं, ताकि वे बुरे वक्त में उनके काम आ सके। वक्त बदल गया, गुरु और चेला का संबध अब पहले जैसा नहीं रहा, अब गुरु, गुरु से गुड़ बन गए और चेला, चेला से शक्कर। इस लिए भूलकर किसी को भी अपना शागिर्द मत बनाइए, वरना एक दिन वही शागिर्द आप के लिए चुनौती बन जाएगा, और तब आपको जिंदगीभर राजकिशोर सिंह की तरह इस लिए अफसोस रहेगा कि क्यों उन्होंनेे शागिर्द बनाया? वैसे भी शागिर्दो के बेवफाई से जिला भरा पटा हुआ है। शागिर्दो के धोखे, बेईमानी और चालाकी से बचना है, तो ‘जगदम्बिकापाल’ जैसा नेता बनना पड़ेगा। यकीन मानिए जिन-जिन नेताओं ने यह सोचकर चेलों की मदद करने की सोची और मदद भी किया, कि वह उनका सहारा बनेगें, उन-उन नेताओं को सबसे अधिक धोखा चेलों से ही मिला। सहारा बनने को कौन कहें, बीच मझधार में छोड़ चले गए। कहने का मतलब अब कोई चेला, गुरु दक्षिणा के रुप में गुरु को अगूंठा काटकर नहीं देते बल्कि मौका मिले तो गुरु का गर्दन काट दें। चेला अपने गुरुओं को बेईमानी और दगाबाजी के रुप में ईनाम दे रहें है। जिस लाइट वाले बाबू साहब को पूर्व मंत्री ने न सिर्फ शागिर्द ही बनाया, बल्कि उन्हें टूटी-फूटी कार से उतारकर पहले स्कापियों पर बैठाया और उसके बाद फारचूनर पर, आज वही बाबू साहब हर्रैया से विधायक बनने के लिए जोरजामाईश ही नहीं कर रहें हैं, बल्कि प्रचार भी कर रहे है। कहने की आवष्यकता नहीं कि पूर्व मंत्री ने इन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाया। इन बाबू साहब को ‘सोने’ का बहुत शोक हैं, यह अपने गले में हर वक्त लगभग 10 से 12 लाख के सोने की मोटी चैन पहने रहते है। जब कि शागिर्द बनने से पहले इनका गर्दन सूना रहता था। पूर्व मंत्रीजी के हमदर्द और करीबियों ने इन्हें बहुत समझाया था, कि आप ऐसे को शागिर्द मत बनाइए, जिसके पिता ने बैंक बनाकर क्षेत्र के लोगों को ठगा और धोखा दिया हो, यहां तक समझाया कि इन्हें षागिर्द बनाकर आपकी बहुत बदनामी होगी, और इसका प्रभाव चुनाव पर भी पड़ सकता है। यह भी कहा था, कि यह आपको कभी भी धोखा दे सकता है, और वही हुआ, जिसका मंत्रीजी के दोस्तों को डर था। ‘हर्रैया’ वाले ‘बाबू साहब’ ने न सिर्फ ‘चंगेरवा वाले बाबू साहब’ को दगा दिया, बल्कि ‘पोखरभिटवा’ वाले ‘बाबू साहब’ को भी नहीं छोड़ा। यह है, बाबू साहबों के ‘गुरु’ और ‘चेलों’ का सच। सवाल उठ रहा है, कि क्या कोई भी नेता लाइट वाले बाबू साहब के भरोसे चुनाव जीत सकता? या फिर जीतने की रणनीति बना सकता हैं? जबाव न में ही मिलेगा। लाइट वाले बाबू साहब जैसे न जाने कितने लोग हैं, जो बड़ा आदमी बनने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं, अपनों की गर्दन तक काटने को तैयार ाहते है। ऐसे लोगों कभी भी धोखा तक देने से बाज नहीं आते है। जिन लोगों ने जमीन से उठाकर आसमान पर बैठाया, मान सम्मान सबकुछ दिया, और जब कर्ज चुकाने की बारी आती है, तो बेईमान और धोखेबाज बन जाते है। पूर्व मंत्रीजी के करीबियों का कहना है, कि मंत्रीजी ने आज तक किसी के साथ न तो बेईमानी किया और न धोखा ही दिया, बल्कि मंत्रीजी को उनके ही लोगों ने धोखा दिया। यह भी कहते हैं, कि मंत्रीजी को ‘आदमी और पत्रकारों’ को पहचानने की क्षमता नहीं हैं, अगर होता तो हर्रैया के लाइट वाले बाबू साहब धोखा न देते। वैसे भी हर्रैया में धोखा देने और धोखा खाने वालों की कोई कमी नहीं है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि जो लाइट वाले बाबू साहब का टूटीफूट कार तब तक स्टार्ट नहीं होती थी, जबकि न्याय मार्ग पर कई लोग धक्का नहीं दे देते थे, आज वह व्यक्ति गले में दस लाख के सोने की चैन पहनकर फारचूनर से चल रहा है। कहा भी जाता है, कि हर व्यक्ति को उचांई पर चढ़ने का अधिकार है। भले ही चाहे लाइट वाले बाबू साहब ही क्यों न हों? पैसा कमाना/बनाना अलग बात हैं, लेकिन लाइट वाले बाबू साहब की तरह उसका प्रदर्शन करना दूसरी बात है। अगर बाबू साहब जैसे लोग दस लाख के सोने की चैन और फारचूनर से चलेगें तो सवाल तो उठेगा ही। जब लाइट वाले बाबू साहब के गुरु लाखों की अगूंठी और चैन पहन सकते हैं, और डिफेंडर से चल सकते हैं, तो क्यों नहीं उनका चेला दस लाख का चैन पहन और फारचूनर से चल सकता?