बस्ती। आज हम आप को यह बताने जा रहे हैं, कि आखिर सारे साक्ष्य और सबूत देने के बाद भी जांच और कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्यों कमिश्नर के जांच के आदेश के बाद भी डीएम स्तर पर जांच को लंबित क्यों रखा जाता? क्यों नहीं शिकायतकर्त्ताओं को यह बताया जाता कि उसकी शिकायत का क्या हुआ? अगर आप लोगों को इतने सारे क्यों का जबाव चाहिए, तो आप लोगों को उस पत्र को समझना होगा, जो दीपक कुमार मिश्र ने कमिश्नर  को 21 फरवरी 26 को दिया। जिला अस्पताल में फर्जीवाड़ा करने वाले मां काली टेडर्स के अमर नाथ यादव को कौन नहीं जानता। इनके टेंडर की जब शिकायत कमिश्नर से करते हुए जांच कराने की मांग की गई, तो कमिश्नर ने डीएम को जांच करने का आदेश दिया। शिकायतकर्त्ता को जब यह लगा कि उसकी शिकायत पर कोई जांच नहीं हो रही है, तो उसने कमिश्नर को एक पत्र लिखा, जिसमें कहा गया कि मां काली टेडर्स के अमर नाथ यादव के द्वारा यह कहा जा रहा है, कि 20 लाख रुपया देकर उसने जांच प्रक्रिया को लंबित करवा दिया, इस लिए चिंता की कोई बात नहीं। यह नहीं लिखा कि 20 लाख किसे दिया गया, 20 लाख तो कोई मामूली रकम तो होता नहीं, इस लिए इतनी बड़ी रकम किसी छोटे मोटे अधिकारी को दिया नहीं गया होगा? कहा गया कि डीएम ने इस मामले में सीडीओ और सीटीओ की संयुक्त जांच बनाई, कहा गया कि जांच कमेटी के द्वारा सीएमओ के यहां सिविल एवं विधुत की शर्तो को बनाया गया, सीएमओ के द्वारा मात्र सिविल निविदा को आमत्रित किया गया, लेकिन विधुत निविदा को नहीं आमत्रित किया गया। कहा गया कि मां काली टेडर्स के द्वारा फर्जी डीएम द्वारा जारी प्रमाण-पत्र पर किए गए फर्जीवाड़ा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। जबकि इससे पहले राम चंद्र चौधरी के द्वारा किए गए शिकायत पर सीटीओ ने शिकायत को सही माना, जिसकी रिपोर्ट डीएम को कार्रवाई के लिए भेजी गई। इस बार भी कमेटी के द्वारा कोई कार्रवाई नहीं की गई, और न ही इसकी जानकारी शिकायतकर्त्ता को ही दी गई। कहा गया कि कमेटी के द्वारा निविदा में बनाई गई शर्तो के विपरीत सीएमओ कार्यालय में नियुक्ति लिपिक एवं जेई सहजातीय ठेकेदार को अनियमित तरीके से अपूर्ण निविदा को पूर्ण दिखाया गया। इनके द्वारा साइट को भी लाक कर दिया गया। ताकि अन्य ठेकेदार दूसरे ठेकेदार का पेपर न देख सके। कहा गया कि निविदा जैसी अतिसंवेदनशील प्रक्रिया में इस प्रकार का साहस मात्र डीएम द्वारा कोई कार्रवाई न करने के कारण ही जनपद में स्वास्थ्य विभाग में गरीब मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं के बजट का भ्रष्टाचार होता है।

कहा गया कि डीएम के द्वारा छह माह से जांच प्रक्रिया को लंबित रखा गया, किसके आदेश पर पोर्टल को लाक किया गया, गार्गी इंटरप्राइजेज द्वारा ज्वाइंट वेंचर के माध्यम से निविदा में भाग लिया गया। कहा गया कि द्वेष भावना से मेरे फर्म को निरस्त किया गया। अयोध्या की फर्म को मार्ग कार्य के लिए पंजीकरण होने के कारण बस्ती में निरस्त कर दिया गया। लेकिन इन्हीं जेई के द्वारा अयोध्या में इस फर्म से कार्य कराया जा रहा है। कहा कि अगर फर्म बस्ती में गलत हैं, तो वहीं फर्म अयोध्या में कैसे सही हो गई? कहा गया कि सीएमओ एवं अन्य अधीक्षक के द्वारा शासन से प्राप्त बजट को बिगत कम से कम दो साल प्राप्त बजट को बार-बार एक ही व्यक्ति के फर्म को क्यों दिया जा रहा? कहा गया कि सीएमओ एवं सीएमएस द्वारा गरीब मरीजों के लिए लगभग एक ही प्रकार का सामान खरीदा जा रहा है, और एक ही वित्तीय साल तें इनके दरों में इतना अंतर कैसे तथा एक स्थान पर एक ही व्यक्ति के द्वारा बनाई गई कई फर्मो को किस आधार पर आर्डर दिया जा रहा है? कहा गया कि इसकी जांच स्वंय की जाए और शासन के विपरीत किए गए समस्त कार्यो के लिए संबधित कर्मचारी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाई जाए। अब सवाल उठ रहा है, जो अमरनाथ यादव नामक ठेकेदार 20 लाख देकर जांच प्रक्रिया को बाधित करवा सकता है, वह कुछ भी कर सकता है?