बस्ती। सीएमओ कार्यालय में बिना डीएल के बड़े पैमाने पर मेडिकल उपकरणों की खरीद का खेल हो रहा है। जबकि नियमानुसार बिना डीएम के किसी भी फर्म से एक इंजेक्षन भी नहीं खरीदा जा सकता। हाइकोर्ट इस मामले में डायरेक्षन जारी कर चुका है, कि अगर किसी सीएमओ या फिर आरसीएच की भूमिका बिना डीएल के सर्जिकल आइटम की खरीद की जाती है, तो इसके लिए साढ़े सात की सजा प्राविधान है, और एनबीडब्लू भी है। अब आप लोग सीएमओ, आरसीएच और चीफ फार्मासिस्ट का खेल समझ गए होगें। सवाल उठ रहा है, कि मान लिजिए, अगर सीएमओ ने जेम पोर्टल से अजय मिश्र की बहु/बेटे के फर्म को टुकड़ों में यानि बिना टेंडर के दस-दस लाख के कई करोड़ के सर्जिकल आइटम की आपूर्ति का आर्डर दिया, तो आरसीएच जिनके पास जेम पोर्टल की चाबी यानि पासवर्ड हैं, उन्होंने क्यों नहीं यह देखा कि जिस फर्म को आपूर्ति करने का आर्डर दिया जा रहा है, क्या उसके पास डीएल यानि डग लाइसेंस हैं, कि नहीं? चूंकि यह तीनों की मिलीभगत रहती है, इस लिए इस तरह के फर्जीवाड़े पर जानबूझकर आंख बंद कर दिया जाता है। अब आप लोग यी भी समझ गए होगें कि सीएमओ ने क्यों सबसे सीनियर और सीएमओ के बराबर एसीएमओ डा. एके गुप्त से आरसीएच का पद छीनकरएक ऐसे हर्रैया अस्पताल के डाक्टर बृजेष षुक्ल को आरसीएच का पद दे दिया गया, जो स्थानीय हैं, और नियमानुसार किसी भी स्थानीय डाक्टर को जिला स्तरीय पद का प्रभार नहीं दिया जा सकता है, चंूकि डा. गुप्त वह नहीं कर पा रहे थे, जो सीएमओ और चीफ फार्मासिस्ट चाहते थे, अजय मिश्र की साजिश के तहत डा. बृजेश शुक्ल को एनएचएम का आरसीएच बनाया गया। आरसीएच बनने के बाद अगर सबसे अधिक हुआ तो वह चीफ फार्मासिस्ट को हुआ। चूंकि सीएमओ और आरसीएच को भी पैसा चाहिए था, इस लिए तीनों एक हो गए, और जब तीनों एक हो गए तो होने लगी तीनों पर पैसे की बरसात। एनएचएम के बाबू संदीप राय ने भी बहती गंगा में खूब हाथ धोया। हालांकि इसकी शिकायत हुई हैं, लेकिन षिकायतों का क्या? अगर बिना डीएल के करोड़ों के सर्जिकल उपकरण की खरीदी और भुगतान की जांच हो जाए तो सीएमओ, आरसीएच और चीफ फार्मासिस्ट की बहु और बेटा साढ़े सात साल के लिए जेल की हवा खाते नजर आएगें। बिना डीएल का यह खेल अन्य फर्मो से भी हो चुका है। जाहिर सी बात जब बिना डीएम के आर्डर और भुगतान किया गया, तो दोनों फर्जी होगा, चूंकि सीएमएसडी स्टोर प्रभारी खुद चीफ साहब हैं, तो फर्जीवाड़ा करने में कोई दिक्कत नहीं हुई होगा। अब सवाल उठ रहा है, कि क्या यह बात चीफ साहब को नहीं मालूम रही होगी, कि बिना डीएल के अगर मेडिकल उपकरण की खरीद फरोख्त और भुगतान हुआ तो साढ़े सात की सजा हो सकती है। मालूम तो सीएमओ और आरसीएच एवं बाबू को भी होगा, चूंकि यह लोग पैसे के इतने भूखे होते हैं, कि इन्हें जेल जाने भी चिंता नहीं रहती। एक ससुर और एक बाप अगर अपनी बहु और बेटे को फर्जीवाड़ा के आरोप में जेल भेजवाने को तैयार हैं, तो ऐसे ससुर और पिता को सार्वजनिक रुप से पुरस्कृत करना चाहिए। वैसे भी सीएमओ कार्यालय में ‘सबसे बड़ा रुपईया होता’ यहां पर रिष्तों, दोस्ती और आपसी भाईचारे का कोई मतलब नहीं। इस कार्यालय में हर कोई एक दूसरे को संदेह की निगाह से देखता है।
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