बस्ती। एक नागरिक की हैसियत से चंद्रेश प्रताप सिंह ने मादी और योगी से पूछ रहे हैं, कि आखिर आप लोगों को लोकतत्र का खतरा किससे?’तीन बार लगातार केंद्र में सरकार किसकी है?’ कहा कि ’लगातार दो बार से उत्तर प्रदेश में सरकार किसकी है?’तो फिर समझ नहीं आ रहा कि लोकतंत्र पर खतरा कहाँ से है और किससे है? अराजकता फैला कौन रहा है?

आज उत्तर प्रदेश में योगी जी के खौफ से अराजक तत्व विलुप्त हो चुके हैं। केंद्र और प्रदेश दोनों सरकारों का सुरक्षा कवच लोकतंत्र पर हावी है। अपराधी या तो जेल में हैं या प्रदेश छोड़ चुके हैं। फिर लोकतंत्र को खतरा किससे? क्या लोकतंत्र को खतरा उस सवर्ण समाज से है जो अपने हक के लिए यूजीसी में एससीएसटी में आरक्षणमें समानता के लिए, और सवर्ण आयोग के गठन के लिए शांतिपूर्ण तरीके से लड़ रहा है? क्या अपने संवैधानिक अधिकार मांगने वाले ही अराजक हैं? क्या वे छात्र-युवा अराजक हैं जो सुचिता, निष्पक्षता और पारदर्शिता की मांग करते हैं? जो पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर प्रोटेस्ट करते हैं? क्या भविष्य मांगना लोकतंत्र को भक्षण करना है?क्या मुख्य चुनाव आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार जी के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लोकतंत्र के हत्यारे हैं? या वे लोकतंत्र को बचाने के लिए सवाल पूछ रहे हैं?क्या रोजगार, रोजी-रोटी मांगने वाले युवा लोकतंत्र के भक्षक और अराजक हैं?

क्या वे किसान, कर्मचारी और मजदूर लोकतंत्र के दुश्मन हैं, जो बिना किसी पूर्व सूचना के, बिना बकाया गन्ना मूल्य और वेतन भुगतान के बंद कर दी गई चीनी मिलों के खिलाफ संविधान और कानून के दायरे में रहकर अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं? जिनका गन्ना मूल्य बड़े-बड़े उद्योगपति और पूंजीपति डकार गए, जिनके वेतन का पैसा मिल मालिक खा गए, जिनको सहारा ने बेसहारा कर दिया - क्या अपनी मेहनत का पैसा, वेतन, नौकरी और उद्योग मांगने वाले सभी लोकतंत्र के शत्रु और अराजक हैं? ’सवाल तो यह है कि अराजक कौन है?’

जो सरकार हंटर और डंडे के बल पर जायज मांगों को दबाए, जनता की आवाज को कुचले  वो अराजक है या जिनके बारे में ऊपर लिखा है वो? जो सरकार लोकतंत्र की निष्पक्षता की रक्षा न कर सके, जो सुचिता न दिखा पाए, जो शपथ लेते समय खाई गई कसमों को तिलांजलि देकर काम करे, तो बताइए अराजक कौन है? लोकतंत्र को खतरा किससे है? क्या सरकार खुद अपनी जग हंसाई कराने पर आमादा है, जो लोकतंत्र की रक्षा करने में और अराजकता व भ्रष्टाचार को समाप्त करने में पूरी तरह अक्षम साबित हो रही है? ’अगर सुचिता और निष्पक्षता साबित ही करनी है तो शुरुआत ऊपर से होनी चाहिए।’ सरकार इसकी शुरुआत अपने सांसदों, विधायकों, मंत्रियों, नेताओं, प्रमुख, जिला पंचायत अध्यक्षों, नगर पालिका और पंचायत अध्यक्षों के यहाँ से करे। इनकी अकूत काली कमाई, बेनामी संपत्ति और भ्रष्टाचार की जांच कराकर जनता के सामने सुचिता और निष्पक्षता का प्रमाण दे।’याद रखिए, हंटर के डर से सर्कस का शेर भी नाचने लगता है, पर वह शेर नहीं रह जाता। आज इस देश में संविधान एक है, कानून एक है, लेकिन न्याय दो तरह का है, धनाढ्यों, पूंजीपतियों और उद्योगपतियों के लिए अलग और गरीबों, मध्यमवर्गीय, किसानों व कर्मचारियों के लिए अलग। यही सबसे बड़ा अराजकता है, यही लोकतंत्र पर सबसे बड़ा खतरा है।