बस्ती। पत्रकारिता पेशे से जुड़े लोगों को यह सोचना होगा कि क्यों आज नेताओं से अधिक पत्रकारों के लिए प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है, कहां गलती और चूक हो रही हैं, अगर गलती हो रही है, तो उसे सुधारने की आवश्यकता है। वरना एक दिन ऐसा भी आ सकता है, जब किसी पत्रकार को इज्जत के साथ कोई चाय भी पिलाना नहीं चाहेगा। जो लोग पहले पत्रकारों को इज्जत और मान सम्मान देते थे, आज वही लोग प्रतिबंधित शब्दों का प्रयोग सार्वजनिक और सोशल मीडिया पर कर रहे है। जब इस मामले में एक पत्रकार से पूछा गया कि भाई ऐसा हम लोग क्यों करते हैं, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप कमेंट होता है। कहने लगे कि जब तक गाली नहीं मिल जाती, तब तक लगता ही नहीं कि कोई खबर भी लिखा। लोगों का काम है, गाली देना और पत्रकार का काम लिखना। यह पत्रकार साहब हर जगह दिखाई दे जाते हैं, इनके भीतर टेंलेंट भरा हुआ, लेकिन यह अपने टेलेंड का सही समय और सही जगह इस्तेमाल नहीं कर पाते, जातिवाद में फंस जाते है। वैसे लिखते बहुत अच्छा है।
ऐसे-ऐसे नेता पत्रकारों को गाली देते हैं, जिनकी राजनीति ही पत्रकारिता पर टिकी हुई। पत्रकारों को सबसे अधिक प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल यही नेता करते हैं। जिन प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल पत्रकारों के लिए नेता करते हैं, उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल, आम जनता नेताओं के लिए कर रही है। जिन पत्रकारों को यह दलाल और चोर कहते हैं, जनता उन्हीं को सबसे बड़ा चोर और दलाल कहती हैं, कहती है, कि जिन लोगों पूरी जिदंगी दलाली और चमचागिरी में बीती हो, अगर ऐसे लोग पत्रकारों के लिए प्रतिबंधित शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो हंसी आती है। नेताओं और पत्रकारों को यह नहीं भूलना चाहिए, कि समाज की पैनी नजर उन पर है, कोई यह बिलकुल ही न समझे कि वह जो कर रहे हैं, उसे समाज देख नहीं रहा है। समाज के लोग इतने जागरुक और दिमागदार हो गएं हैं, कि कमेंट और खबर पढ़ते ही वह बता देते हैं, कि कौन सी खबर और कमेंट किस लिए और क्यों लिखी गई? नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए, कि पत्रकार कभी खबर लिखने या न लिखने के कारण गडडी लेते आज तक नहीं पकड़ा गया। लेकिन नेता अवष्य पकड़े गए। उन पत्रकारों को सावधान रहना होगा, जो पेड न्यूज लिखते या चलाते है। एक पत्रकार ने कहा कि पहले के पत्रकार के साथ कोई अभद्र व्यवहार कोई करता था, तो सारे लोग उसके खिलाफ न सिर्फ खबरे लिखते थे, बल्कि धरना प्रदर्षन के जरिए कार्रवाई करने की मांग भी करते थे, और तब तक धरना-प्रदर्षन करते थे, जब तक कि कार्रवाई नहीं हो जाती। इसी लिए किसी की हिम्मत नहीं पड़ती थी, कि पत्रकारों को अनावष्यक रुप से कोई क्षति पहुंचा सके। जो एकता और एक दूसरे पत्रकारों के प्रति जो जज्बा पहले था, आज वह नहीं दिखाई दे रहा है, आज हर कोई अपनी डफली और अपना राग अलाप रहा है। पत्रकारों के साथ कुछ भी हो जाए, मदद करने को कौन कहे, कोई यह यह जानने का प्रयास भी नहीं करता कि हुआ क्या? कहना गलत नहीं होगा, कि आज जो जगह-जगह पत्रकारों के साथ शोषण और उत्पीड़न होने की घटनाए सामने आ रही है, उसका सबसे बड़ा कारण एकता का अभाव होना। आज का पत्रकार अपने साथी के लिए बड़ी मुस्किल से साथ में ज्ञापन देने जाने के लिए तैयार होते है। खबर लिखना तो दूर की बात है। खास तौर पर जो अपने आप बड़े अखबार के रिपोर्टर कहते हैं, उन्हें लगता ही नहीं कि उनके किसी साथी की मदद करनी चाहिए। जिस तरह प्रिंट और चैनल मीडिया का बटवारा हुआ, उसने वाकई पत्रकारों को कमजोर कर दिया, रही सही कसर अलग-अलग संस्था बनाने से पूरा हो गया। इन्हीं सबके चलते पत्रकारों की पहचान समाप्त होती जा रही है। जिन अखबारों के चीफ साहबों की कभी तूती बोलती थी, और बड़े-बड़े अधिकारी कार्यालयों में खुद मिलने जाते थे, आज वही चीफ साहबों को सलाम बजाने के लिए अधिकारियों के पास जाना पड़ रहा है। हालत यह है, कि आम लोगों की तो छोड़िए चीफ साहबों का नाम अधिकांश पत्रकारों को नहीं मालूम होगा रही बात उनके रिपोर्टर की तो बेचारे अगर यह चाह जाएं कि अपने किसी की एक खबर छपवा दें, तो नहीं छपवा सकते। नाम के यह लोग बड़े अखबारों के रिपोर्टर रह गए। यह लोग अपनी इज्जत बचाने के लिए खबर छपवाने के लिए दूसरे अखबार के लोगों से सिफारिश करते है। पत्रकारों को सोषल मीडिया पर कमेंट के बदले कमेंट करने से बचना चाहिए, बल्कि समय और अवसर का इंतजार करना चाहिए। पत्रकारों को अपनों का साथ देना चाहिए, गैरों का नहीं।
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