बस्ती। जिस ‘मां लक्ष्मी टेडिगं’ के नाम सिविल के कार्यो का अनुबंध, उसे पिछले दो सालों से एक रुपया का भी काम नहीं मिला, और जिसके नाम कोई अनुबंध नहीं वह लाखों कमा रहा है। वर्क आर्डर के नाम पर 20-20 हजार का काम एक ही फर्म के व्यक्ति को बार-बार दिया जा रहा है, जब कि नियमानुसार किसी भी फर्म को एक साल में सिर्फ एक बार ही वर्क आर्डर दिया जा सकता है। जिसने जितना अधिक कमीशन दिया, उसे उतना अधिक वर्क आर्डर मिल गया। एक तरह से देखा जाए तो महिला अस्पताल में ‘करामत’, जिला अस्पताल में ‘शफाक’ और टीबी अस्पताल एवं सीएमओ कार्यालय में ‘दीवानचंद्र पटेल’ का कब्जा है। यही तीनों मिलकर मलाई काट रहें है। ‘बाबूजी’ की मेहरबानी से मलाई काटने के जय कांस्टक्षन के जनेष्वर चौधरी आ गए। एक तरह से मलाई काटने का काम चौकड़ी कर रही हे। रही बात मां लक्ष्मी टेडिगं के घनष्याम मिश्र की तो लगता है, कि इनकी किस्मत में मलाई काटते हुए देखते रहने को लिखा है। किसी को नियम कानून की कोई परवाह नहीं, सबको कमीशन चाहिए, इन लोगों का बस चले तो जिले भर का अस्पताल बेच दें। जितना पैसे की भूख स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और ठेकेदारों में देखी जा रही है, उतना अन्य विभाग के अधिकारियों में नहीं। यहां तक कि सरकारी धन के दुरुपयोग को रोकने वाले सीटीओ को अगर उनके अनुसार कमीशन मिल जाए तो वह पूरे जिले का भुगतान एक ही व्यक्ति को कर दें। अब जरा अंदाजा लगाइए कि ‘दीपक कुमार मिश्र’ नामक व्यक्ति ने सारे साक्ष्य के साथ शिकायत की, सीडीओ और सीटीओ जांच अधिकारी बनाए गए, चार माह बीत गए, लेकिन जांच पूरी नहीं हुई, अलबत्ता सीटीओ भुगतान पर भुगतान करते जा रहें हैं। इन्हें इस बात का जरा सा भी अभास नहीं कि जिसकी वह जांच कर रहे हैं, उसी का फर्जी भुगतान भी कर रहे है। भुगतान करने से पहले यह तक नहीं देखते कि जिस फर्म के नाम अनुबंध हैं, उसका बिल क्यों नहीं आ रहा है? और जिसके नाम नहीं हैं, उसका बिल क्यों आ रहा है? यह जानते हुए कि भुगतान नहीं किया जा सकता, फिर भी कमीशन के चक्कर में किए जा रहे है। सीडीओ साहब को भी यह देखने की फुर्सत नहीं कि क्यों नहीं अभी तक जांच पूरी हुई, और बिना जांच पूरा हुए भुगतान कैसे हो रहा है? सबसे अधिक मलाई दीवान चंद्र पटेल काट रहे है। जनरल बजट के नाम पर एक साल में जिला अस्पताल में 30 लाख, महिला अस्पताल में 10-12 लाख, टीबी अस्पताल में सात लाख आता है, इसी तरह सीएमओ की ओर से 17 सीएचसी को दो-दो लाख के हिसाब से 34 लाख जाता है। अनुबंध के अनुसार इसका काम मां लक्ष्मी टेडिगं को मिलना चाहिए। लेकिन नहीं मिल रहा है, और उसे मिल रहा है, जो कमीशन दे रहा है। कमीशन देने वालों के लिए दरवाजा खुला है, और न देने वालों के लिए बंद रहता है। यहां पर सभी कमीशन के पुजारी है। एमओआईसी मुंडेरवा, बनकटी, साउंघाट और बहादुरपुर तो खुद ठेकेदार बन गएं है। हर साल दो लाख रंगाई पोताई के नाम सीएचाी को जाता, लेकिन एक भी एमओआईसी के द्वारा रंगाई पोताई नहीं करवाई जाती, और धन का बंदरबांट कर लिया जाता है। इससे बड़ा कमीशनबाजी का खेल और क्या हो सकता है, कि जिला महिला अस्पताल में सिविल कार्यो का बिल फार्मासिस्ट अनिल चौधरी के द्वारा किया जाता है, जबकि अस्पताल में जेई एसबी सिंह तैनात है। यह भी सीटीओ साहब नहीं देखते, देखेगें कैसे जब उन्हें कमीशन मिलता है।
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