बस्ती। ब्राहृमण महासभा में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है, जिस मंदिर पर लोगों की आस्था रही, अगर उसी आस्था पर चोट किया जाए, तो कुछ भी नहीं बचेगा। ऐसा लगता है, कि मानो इसके जिम्मेदारों ने अपनी जिम्मेदारी को नहीं निभाया, अगर निभाया होता तो कोई यह नहीं कहता कि इसपर कुछ लोगों का कब्जा हो गया। अगर कब्जा करने वाला यह कहे, कि उसे ब्राहृमण महासभा से ‘कोई नहीं निकाल सकता, बल्कि मैं जिसे चाहूं उसे निकाल सकता हूं’। तो समझ लेना चाहिए, कि ब्राहृमण महासभा किस दिशा की ओर जा रहा है। अभी तक तो चंदा और पत्थर चोरी के साथ हिसाब-किताब की बाते हो रही थी, लेकिन अब तो बाइलाज को सार्वजनिक करने की मांग उठने लगी। यह सवाल इस लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योकि अगर किसी पदाधिकारी को बाइलाज के बारे में जानकारी नहीं तो इसका मतलब यह हुआ, कि उसे ब्राहृमण महासभा के बारे में कुछ भी जानकारी नही। जब किसी को बाइलाज की जानकारी ही नहीं होगी तो वह समाज में ब्राहृमण महासभा से लोगों को जोड़ने के लिए क्या बताएगें? बाइलाज की जानकारी इस लिए सभी को होनी चाहिए, क्यों कि जानने का उनका अधिकार है। पता नहीं अभी तक क्यों नहीं बाइलाज के बारे में सवाल उठा? और क्यों नहीं अभी तक इसे सार्वजनिक किया गया?

प्रशांत पांडेय लिखते हैं, कि संगठन का बाइलाज सार्वजनिक किया जाए, इसकी प्रति सभी सदस्यों को उपलब्ध कराई जाए, साथ ही इसे संगठन के आधिकारिक व्हाट्सअप समूह एवं अन्य माध्यमों के जरिए साझा किया जाए, ताकि प्रत्येक सदस्य अपने अधिकारों, कर्त्तव्यों और संगठन की कार्यप्रणाली की जानकारी हो सके। कहा कि पारदर्शिता, विष्वास और लोकतांत्रिक व्यवस्था की शुरुआत संगठन के संविधान को सार्वजनिक करने से ही होगी। ई. राधेष्याम पांडेय सवाल करते हैं, कि ब्राहृमण महासभा का बाइलाज किसी एक व्यक्ति के पास क्यों? क्यों नहीं महामंत्री उसकी कापी किसी को देना नहीं चाहते? जबकि महासभा का संचालन बाइलाज के हिसाब से होना चाहिए, न कि किसी एक व्यक्ति की इच्छा से। कहा कि प्रस्तावित दो अगस्त 26 को अगर मीटिगं नहीं करवाई जाती है, तो यह माना जाएगा, कि बहुत बड़ा घपला हुआ है। राकेश कुमार पांडेय कहते हैं, कि महासभा को पदाधिकारीगण स्वंय की संपत्ति मानते हैं, सभी राजकुमार है। मनमाना आचरण है, ऐसे लोग ही चाहिए, जो गांधीजी के बंदर की तरह चुपचाप बैठे रहें, लोगों की मनमानी को देखते रहे, कुर्ता टाइट रहे, 2002 से लेकर अभी तक यही हुआ, 2002 से लेकर आज तक प्रदेश और जिले स्तर पर तमाम ब्राहृमण समाज के लोगों के साथ बर्बरता हुई, लेकिन एक ज्ञापन तक नहीं दे पाए, विरोध और आक्रोष तक नहीं दिखाया। क्या यही ब्राहृमण महासभा की पहचान है? प्रशांत पांडेय ने बहुत ही अच्छी बात कही, कहा कि याद रखिए, सत्य बोलने वाले पर कीचड़ उछालना आसान है, लेकिन सत्य का उत्तर देना कठिन। इतिहास यह नहीं पूछेगा कि जब संगठन गलत दिशा में जा रहा था, तब कौन बोल रहा था, और कौन मौन था? कहा कि मेरे इस्तीफे पर जितनी उर्जा खर्च की जा रही है, अगर उसका आधा भी संविधान लागू कराने में लगाई होती, तो आज यह नौबत ही नहीं आती। आज त्याग करने वालों पर सवाल किए जा रहे हैं, लेकिन व्यवस्था को बंधक बनाने वालों से कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा। जब संगठन का संविधान सालों तक ताक पर रखा था, आजीवन सदस्यता नहीं खोली गई, चुनाव नहीं कराए गए, नये लोगों का रास्ता रोका गया, तब संगठन निष्ठा किस मौन साधना में लीन थी। महामंत्रीजी एक-एक पैसे का हिसाब प्रमाण के साथ दे। जो लोग महामंत्री के पक्ष में बोल रहे हैं, उनसे भी सवाल है, कि आखिर हिसाब देने में आपत्ति क्यों? ब्राहृमण महासभा का पैसा है, उसका हिसाब तो देना ही होगा। यह महासभा किसी के बाप की जागीर नहीं, यह पूरे ब्राहृमण समाज की संस्था है, किसी को मनमाने तरीके से पद देना, नियुक्ति करना और संगठन को एक व्यक्ति या एक समूह की तरह चलाना उचित नहीं हैं, अगर लाखों खर्च हुआ तो मंदिर पूरा क्यों नहीं हुआ? अंबिका पांडेय लिखते हैं, कि संगठन किसी की जागीर नहीं, समाज की सामूहिक चेतना का दायित्व है, मौन यदि अन्याय के सामने टिक जाए तो वह विवेक नहीं, सहभागिता बन जाता, पद का गौरव अधिकार से नहीं, पीड़ितों के पक्ष में खड़े होने से सिद्व होता है, इतिहास उन्हीं को याद रखता है, जिन्होंने सुविधा नहीं, कर्त्तव्य को अपना धर्म बनाया। आलोक मिश्र जी लिखते हैं, कि जीवन का यह भी एक सत्य है, कुछ लोग दीपक के प्रकाश में साथ चलते हैं, परंतु तेल भरने का दायित्व नहीं निभाते, जब तक अवसर और प्रभाव रहता है, तब तक मौन रहते हैं, और जब प्रभाव समाप्त हो जाता है, तो प्रष्नों की आवाज उंची हो जाती है।