बस्ती। ब्राहृमण महासभा मंदिर के निर्माण के नाम पर मिले चंदे का हिसाब 20 साल में नहीं दिया गया, तो सवाल महांमत्री शंभूनाथ मिश्र उठेगा हीं, अगर महांमत्री पर सवाल उठा तो राष्टीय अध्यक्ष अषोक कुमार षुक्ल पर भी सवाल उठेगें। इससे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब आय का ब्यौरा सार्वजनिक किया जा सकता है, तो व्यय का ब्यौरा क्यों नहीं? इस क्यूं में इतने राज छिपे हैं, कि अगर खुल गया तो अनेक लोग बेनकाब हो जाएगें। व्यय का ब्यौरा न देने के पीछे महामंत्री को सदस्य चंपत राय जैसा बता रहे है। महामंत्री के अतिकरीबियों का भी कहना है, कि जब महामंत्री चंदा को सार्वजनिक कर सकते हैं, तो क्यों नहीं इन्होंने इन 20 सालों में व्यय को सार्वजनिक किया? कहते हैं, कि अगर शंभूनाथ मिश्र वाकई ईमानदार बनना चाहते हैं, तो उनकी ईमानदारी भी दिखनी चाहिए, और यह ईमानदारी तब दिखेगी जब लेन-देन में पारदर्षिैता होगी। जिसका महामंत्री में अभाव है। कहते हैं, कि महामंत्री को 80 लाख का तो हिसाब-किताब बिल बाउचर के साथ तो देना ही पड़ेगा, हिसाब देने से भागना, यह बताता है, कि कुछ तो गड़बड़ है। अगर दूसरों का हक मारने वालों को इतनी बड़ी जिम्मेदारी दे दी जाएगी तो सवाल उठेगें ही। अगर 20 साल बाद भी मंदिर का निर्माण पूरा नहीं होता तो निर्माण समिति पर भी सवाल उठेगें। जिस मंदिर की रखवाली पर महासभा अब तक 48 लाख खर्च कर चुका हैं, और फिर भी मंदिर अपूर्ण रहें, तो इससे जुड़े प्रत्येक पदाधिकारियों पर सवाल उठेगा। चंदें का एक बड़ा हिस्सा इसके रखवाली पर खर्च हो रहा है, फिर भी लाल पत्थर की चोरी हो गई है। सवाल तो यह भी उठ रहा है, कि जब बाइलाज के अनुसार हर पांच साल में चुनाव होना चाहिए तो क्यों नहीं 20 सालों में एक बार भी चुनाव करवाया गया? क्यों कुछ लोगों की ही ब्राहृमण महासभा की जागीर बनने दिया? अगर नियमित चुनाव होता तो परिवारवाद का जहर ब्राहृमण महासभा में न फैलता, और इसके लिए काफी हद तक राष्टीय अध्यक्ष को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। बाइलाज तो यह भी कहता है, कि पांच सौ रुपया से अधिक कैश रखा ही नहीं जा सकता, लेकिन लाखों रुपया कैश रखा जाता है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि आखिर किसके आदेश पर महामंत्री हिसाब-किताब का ब्यौरा और रिकार्ड अपने आवास पर रखते, जब कि उसे मंदिर में रखना चाहिए, आखिर इसके पीछे क्या मंशा हो सकती है? यह तो महामंत्री ही बता पाएगें। सवाल उठ रहा है, कि इतना चंदा मिलने के बाद भी महासभा क्यों तीन लाख के नुकसान में? इन सारे सवालों का जबाव महामंत्रीजी ही दे सकते है। महामंत्रीजी ने आज से चार-पांच साल पहले मंदिर के चारों तरफ दुकाने बनवाने का प्रस्ताव रखा था, और कहा था, कि डिपाजिट का जो पैसा आएगा, उससे मंदिर का निर्माण होगा। यह भी कहा गया, कि जिस दिन मंदिर का निर्माण हो जाएगा, उसी दिन अध्यक्षजी अपना पद छोड़ देगें, इसके पीछे साले को राष्टीय कार्यकारिणी में वरिष्ठ उपाध्यक्ष बनाना था। एक बार तो लगभग छह साल पहले गुप्त रुप से बैठक हुई, जिसमें राष्टीय अध्यक्ष को ही उनके पद से हटा दिया गया, पता चलते ही अध्यक्षजी बैठक में पहुंचे, तब इनका तेवर देख लोग भाग खड़े हुए, इसमें भी महामंत्री की साजिश बताया गया। संगठन के विस्तार पर आवाज उठाने के बावजूद कोई जोर नहीं दिया जा रहा है, कहा जाता है, कि एक बार महामंत्री भाग सकते हैं, लेकिन राष्टीय अध्यक्ष अपनी जिम्मेदारी से नहीं भाग सकते। इतने सालों बाद भी मंदिर निर्माण न होने के लिए राष्टीय अध्यक्ष की भी जिम्मेदारी बनती है। अब तो इस मंदिर के पूर्ण होने पर भी संशय बना हुआ है। कोई मिश्राजी से यह तो पूछे कि क्यों उन्होंने अपने नातेरिष्तेदारों को आजीवन सदस्य बनाया, इस लिए बनाया, ताकि अगर चुनाव हो तो उन्हें ही महामंत्री का पद मिले। क्यों कि वोट करने का अधिकार सिर्फ आजीवन सदस्य को ही है।
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