‘सोनहटी’ के ‘कोटेदार’ ने ‘तलाक’ के एक ‘साल’ बाद प्रधान पत्नी को बनाया मां, क्या ‘तलाक’ के एक ‘साल’ बाद ‘पति’ अपनी ‘पत्नी’ को ‘गर्भवती’ कर ‘सकता’?

बस्ती। विकास खंड सांउघाट के ग्राम पंचायत सोनहटी के कोटेदार गुलाम हुसैन ने सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान और पत्नी की प्रधानी बचाने के लिए पत्नी हसीना बानो को दस रुपये के स्टांप पर फर्जी तलाक दे दिया, सवाल उठ रहा है, कि जब कोटेदार ने पत्नी को तलाक दे दिया, और लिखकर दे दिया कि अब पति और पत्नी दोनों अलग-अलग रहे हैं, और न तो पति का पत्नी से और न पत्नी का पति से कोई संबध रह गया, तो फिर एक साल 13 दिन बाद कैसे प्रधान पत्नी को लड़का हो गया? किसने उन्हें मां बनाया? परिवार रजिस्टर में बच्चे के पैदा होने की तिथि और उसके माता-पिता का नाम गुलाम हुसैन और हसीना बानू लिखा हुआ है, और जब परिवार रजिस्टर में पति के रुप में कोटेदार गुलाम हुसैन और प्रधान के रुप में पत्नी का नाम हसीना बानू दर्ज हैं, तो तलाक कहां हुआ? अगर तलाक के बाद बच्चा पैदा होता है, तो फिर बच्चे का पिता कौन है? इससे साफ पता चलता है, कि कोटेदार ने निरस्त कोटे को पाने और पत्नी की प्रधानी बचाने के लिए न्यायालय में झूठ बोला। हैरान करने वाली बात हैं, कि अपर आयुक्त प्रशासन मनोज कुमार तिवारी ने फर्जी तलाक को सही मानकर एसडीएम के निस्तीकरण के आदेश 12 जून 26 का निरस्त कर दिया, और यह कहते हुए पत्रावली को एसडीएम के पास भेज दिया कि पक्षों को सुनवाई एवं साक्ष्य का अवसर दिया जाए और साक्ष्य एवं अभिलेखों आदि का परीक्षण करते हुए मुख्य आदेश पारित किया। इस मामले सरकार की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी दुर्गा प्रसाद उपाध्याय लिखित में साक्ष्य एवं रुलिगं का हवाला देते हुए न्यायालय में दलील दिया कि एसडीएम ने जो कोटा निरस्त करने का आदेश दिया, वह नियमानुसार दिया, सरकारी अधिवक्ता चिल्लाते रह गए, कि न तो कोटा बहाल करने योग्य हैं, और न एसडीएम के आदेश निरस्त करने योग्य हैं। सरकारी अधिवक्ता का कहना है, कि मेरा काम आदेश करना या करवाना नहीं, कहा कि उन्होंने राज्य सरकार की ओर से लिखित में कोटा बहाली/एसडीएम के आदेश को निरस्त करने का विरोध जता चुके है। अपर साहब ने न तो परिवार रजिस्टर का परीक्षण किया और न दस रुपये के स्टांप पर दिए गए तलाक की सत्यता जानने का ही प्रयास किया, न जाने किस आधार पर इन्होंने दस रुपये के तलाकनामा को न्यायालय का तलाकनामा मान लिया, जबकि किसी भी न्यायालय ने तलामनामा को स्वीकार नहीं किया। अपर साहब ने यह तक नहीं देखा कि कैसे कोटेदार ने तलाक के एक साल 13 दिन बाद अपनी प्रधान पत्नी को गर्भवती कर दिया और लड़का पैदा हो गया? हालांकि अपर साहब ने कोटा को बहाल नहीं किया, लेकिन एसडीएम के आदेष को निरस्त कर नमक का हक अदा अवष्य कर दिया। सबसे बड़ा सवाल उठ रहा है, कि जब कोटेदार ने पत्नी हसीना बानो को 2013 में तलाक दे दिया तो फिर उसके बाद के चुनाव में कैसे अपनी और पत्नी का फोटो लगाकर प्रचार किया?

इस फर्जीवाड़े में बीडीओ, एडीओ पंचायत सहाबुदीन और सचिव अशोक कुमार की भूमिका संदिग्ध रही। जब कोटा निरस्त हुआ तो नियमानुसार बीडीओ को किसी महिला समूह के नाम खुली बैठक करवाकर चयन कर लेना चाहिए था, इसके लिए पांच बार बीडीओ की ओर से बैठक की सूचना जारी हुई, और हर बार कोटेदार कोई न कोई बहाना बनाकर बैठक को बीडीओ की मिलीभगत से निरस्त करवाते रहें, ताकि जो अपील कोटेदार ने अपर आयुक्त न्यायालय में दाखिल किया, उसका निस्तारण हो सके, कोटेदार को अच्छी तरह मालूम था, कि जब उसने अपर साहब को सेट कर लिया तो उनकी अपील स्वीकार होनी ही है, और वही हुआ, जो कोटेदार चाहता था, अपर साहब ने कोटेदार की अपील को स्वीकार करते हुए एसडीएम के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जो उन्होंने 12 जून 26 को दिया था। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि अपर साहब ने क्यों जिला शासकीय अधिवक्ता की दलील को ठुकरा दिया? कोटेदार ने कोटे के बल पर पत्नी हसीना बानो को दो बार प्रधान बनाया, प्रधान बनते ही इन लोगों ने चार कीमती जमीनों का बैनामा करवाया, खास बात यह है, कि तलाक होने के बाद भी बैनामों में पति गुलाम हुसैन ही गवाह है। इससे साफ पता चलता है, तलाकनामा फर्जी है, यह पहली बार देखा गया गया कि दस रुपये के स्टांप पर तलाक हो गया। जिस प्रधान और कोटेदार के प्रभाव में बीडीओ, एडीओ पंचायत, सचिव और अपर आयुक्त साहब हो, उस कोटेदार और प्रधान का क्या कोई कर लेगा? वैसे अपर आयुक्त न्यायालय पर इससे पहले न्याय बेचने का आरोप लग चुका है, जिसके लिए तत्कालीन अपर साहब को कईयों को पैसा भी वापस करना पड़ा, पैसे के लिए इन्हें इनके सरकारी आवास पर बंधक तक बनाया जा चुका है। यही कारण है, कि कोटा के मामले में इनके आदेश पर सवाल खड़े हो रहें है। शिकायतकर्त्ता राजमन पुत्र भागीरथी की सारी मेहनत को अपर साहब ने बेकार कर दिया, और ऐसे कोटेदार के हाथ में कोटा सौंप दिया, जिसकी पत्नी प्रधान हैं, और नियमानुसार पति कोटेदार और पत्नी प्रधान नहीं हों सकते, इस लिए कहा जाता हैं, इस मामले में बड़ी डील हुई, गांव में किसी से भी पूछ लीजिए वह बता देगा कि कोई तलाक नहीं हुआ, दोनों आज भी पति और पत्नी के रुप में एक साथ एक ही आवास में जीवन यापन कर रहे है। कोई कोटेदार और प्रधान इतना नीचे गिर सकता है, अगर इसका सच देखना होतो सोनहटी में जाकर देख सकता है। प्रधान और कोटेदार के फर्जीवाड़े की चर्चा हर कोई कर रहा है, अगर ऐसा नहीं होता तो कोटा निरस्त नहीं होता।