बस्ती। बार-बार मीडिया सवाल उठा रही है, कि क्यों नहीं प्रशासन और शासन स्तर से भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई होती? आखिर वे कौन लोग हैं, जो इनका बचाव कर रहे हैं? क्या बचाव करने वाले शासन और प्रशासन से अधिक मजबूत हो गए हैं? अगर नहीं हैं, तो क्यों नहीं कार्रवाई होती? और जब तक कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार कम नहीं होगा। ऐसे में सबसे बड़ा संकट उन शिकायकतकर्त्ताओं के सामने खड़ा हो रहा है, जो किसी तरह हिम्मत करके भ्रष्ट लोगों के खिलाफ शिकायत करते है। सवाल तो यह भी उठ रहा है, कि आखिर कब तक गगांराम यादव और उमेश गोस्वामी जैसे लोग भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ेगें? अपनी जान को जोखिम में डालकर जिस तरह यह दोनों भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आवाज उठाते हैं, अगर इन दोनों की शिकायतों पर ही जांच हो जाए तो न जाने कितने भ्रष्टाचारी जेल में नजर आएगें। गंगाराम यादव देश का पहला ऐसा व्यक्ति होगा, जिसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का खामियाजा जेल जा कर भुगतना पड़ा। यह अब तक दो बार आत्मदाह करने का प्रयास कर चुका है, एक बार तो जान-जाते-जाते बच गया, और दूसरी बार पुलिस वालों ने बचा लिया, जेल भी जाना पड़ा, फिर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का जज्बा कम नहीं हुआ, यही वह व्यक्ति है, जिसने बनकटी के ग्राम पंचायत बेहिल में चार सौ से अधिक फर्जी मनरेगा जाब कार्ड को निरस्त करवाया, इसी के चलते बेहिल में भ्रष्टाचार कम हुआ, इनका कहना है, कि अगर उसके भ्रष्टाचार की लड़ाई में डीएम, सीडीओ, बीडीओ और सचिव साथ दे तो बेहिल से भ्रष्टाचार का पूरी तरह खात्मा हो जाएगा, लेकिन यहां पर साथ देने के बजाए उसी के खिलाफ फर्जी आरोप में मुकदमा दर्ज करवा दिया जाता है। इस व्यक्ति को मैनेज करने के लिए तरह-तरह के लालच दिए गए, जान से हाथ धोने की धमकी भी दी गई, लेकिन यह अपने मुहिम में लगा रहा, इसका मुहिम मुंबई में रहते हुए भी जारी रहता है। बिडंबना यह है, कि इस व्यक्ति का साथ न तो अधिकारी और न कोई नेता ही दे रहा हैं, जो काम नेताओं का उसे गंगाराम यादव जैसा व्यक्ति कर रहा है। यह पहला ऐसा व्यक्ति होगा, जो आज तक मैनेज नहीं हुआ, और न शिकायत को ही कभी वापस लिया। होना तो यह चाहिए कि ऐसे व्यक्ति को सार्वजनिक रुप से सम्मानित करना चाहिए, लेकिन ऐसा कोई नहीं कर रहा है, क्यों नहीं कर रहा है, इसे हम और आप अच्छी तरह जानते है।  

अब जरा 40 किलो के कुदरहा के बैसिया कला निवासी उमेश गोस्वामी के बारे में जान लीजिए, भ्रष्टाचारियों का बस चलता तो इसे अब तक दुनिया से ही बिदा कर दिए होते है। एक बार करने का प्रयास भी किया गया, गले में बेल्ट बांधकर लटकाया भी, फिर भी भ्रष्टाचारियों की मंशा पूरी नहीं हुई, स्वास्थ्य विभाग के सीएमओ से लेकर डिप्टी सीएमओ, एएनएम से लेकर फार्मासिस्ट, अल्टा साउंड से लेकर पैथालाजी और नर्सिगं होम तक कोई ऐसा नहीं बचा जिसे गोस्वामीजी ने चोट न पहुंचाया हो, यह अपनी लड़ाई के जरिए हेल्थ विभाग के कई लोगों के खिलाफ कार्रवाई करवा चुका है। यह वही गोस्वामीजी है, जो सीधे कृषि मंत्री से मिले और कहा कि आपका जिला कृषि अधिकारी खाद की कालाबाजारी करवा रहा हैें, और आप इस लिए कार्रवाई नहीं कर रहे हैं, क्यों कि आप को भी हिस्सा मिलता है। मंत्रीजी नाराज तो बहुत हुए और कह दिया कि जितने भी किसाान यूनियन के लोग वे सभी चोर हैं, तब गोस्वामीजी ने कहा कि मंत्रीजी यूनियन वाले नहीं बल्कि आप और आप का जिला कृषि अधिकारी चोर है। कोई ऐसा तहसील दिवस नहीं जहां पर यह षिकायत लेकर नहीं पहुंचता, सीएमओ साहब इसे देखते ही कुर्सी से उठ जाते हैं, और पूछने लगते हैं, कि कोई काम हो तो बताइए। गंगाराम यादव की तरह उमेश गोस्वामी भी न तो कभी मैनेज हुआ और न कभी शिकायत ही वापस लिया। इसकी भी कोई नेता मदद नहीं करता, कहते हैं, कि अगर अधिकारी और नेता उसे भ्रष्टाचार की लड़ाई में साथ दे तो वह भ्रष्टाचारियों के रातों की नींद हराम कर दे। दिक्कत यह है, कि शासन और प्रशासन ऐसे लोग को कुछ और समझते है। इन दोनों शिकायतकर्त्ताओं को पागल तक करार दिया जा चुका है। इन दोनों का साथ कोई दे या न दें, लेकिन मीडिया अवष्य देती है, और मीडिया ऐसे लोगों को ही हीरो मानती है। देखा जाए तो ऐसे लोगों को आम जनता भी सपोर्ट नहीं करती। पता नहीं क्यों, एक तो लोगों ने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ना बंद कर दिया, और जो लड़ता है, उसे सपोर्ट भी नहीं करते।