बस्ती। वन विभाग में पौध उगाने और पौध रोपण के नाम पर इतना फर्जीवाड़ा होता, कि सभी चकित है। हर साल लगभग 10 से 12 करोड़ का बजट पौध रोपण और पौध उगाने के नाम पर आता है। कहा जाता है, कि अगर बजट का आधा भी सही तरीके से खर्च कर दिया तो जिले में पौधरोपण के लिए एक इंच जमीन ही न मिले। कागजों में हरियाली के नाम पर जिला दूसरे स्थान पर आ गया, जिसका एचएमवी रिकार्ड ‘दिषा’ की बैठक में भी मैडम डीएफओ की ओर से बजाया चुका है। जब कि हरीश सिंह की ओर से कहा भी गया कि मैडम, इसमें आप का कोई क्रेडिट नहीं हैं, यह तो हम जैसे लोगों का देन है, जिन्होंने खुद पौधरोपण किया, आप तो कागजों में हरियाली दिखाती है, और हम लोग वास्तव में। सवाल उठ रहा है, कि जब वन रक्षक को नौकरी बचाने के लिए 50 फीसद और माली को 70 फीसद कमीशन देना पड़ता है, तो कैसे जिला हरियाली के मामले में दूसरे स्थान पर आ गया, जाहिर सी बात है, हरियाली तो कागजों में ही दिखाई देखी। किसी को भी माली से वन रक्षक बनाने का अधिकार नहीं हैं, लेकिन इस लिए बना रहे हैं, ताकि 70 फीसद कमीशन मिल सके। जाहिर सी बात हैं, कि अगर माली 70 फीसद कमीशन देगा तो वह काम 20 फीसद करेगा, 10 फीसद अपने लिए रखेगा। इसी तरह वनरंक्षक अगर 50 फीसद कमीशन देता तो वह भी 20 फीसद काम करेगा, 30 फीसद अपने लिए रखेगा। इस तरह देखा जाए तो काम तो हर साल 20 फीसद ही होता है, और 80 फीसद कमीशन में चला जाता है, जिसमें 10 फीसद माली और 30 फीसद वन रक्षक अपने पास रख लेता है। इसी लिए रेंजर माली को वन रक्षक बनाता, ताकि वह वन रक्षक से 20 फीसद अधिक कमीशन ले सके, वन रक्षक 50 फीसद तो माली 70 फीसद कमीषन देता है। माली को यह कहकर वन रक्षक बनाया जाता है, कि तुमको वन रक्षक से 20 फीसद अधिक कमीशन देना पड़ेगा। माली भी हंसी खुशी वन रक्षक इस लिए बनने को तैयार हो जाता है, ताकि उसे नर्सरी से मिटटी खोदने और रोपाई से फुर्सत मिल सके। इस मामले में डीएफओ की भी मिली भगत रहती है, क्यों कि डीएफओ चाहे तो वह सीधे नियुक्ति कर सकती है, लेकिन वह रेंजर के पास भेज देती हैं, ताकि उन्हें भी हिस्सा मिलता रहं, जब कि माली को वन रक्षक बनाने का अधिकार रेंजर को नहीं है। नियम विरुद्व माली को वन रक्षक बनाए जाने का खेल रामनगर, कप्तानगंज, हर्रैया और बस्ती में हो रहा है। जब कि शासनादेश है, कि किसी भी दशा में किसी माली को वन रक्षक न बनाया जाए, इसका विरोध फारेस्ट मिनिस्टीरिएल एसोसिएषन भी शासन में दर्ज करा चुका है। यहां तक कि मैडम डीएफओ भी नौ दिसंबर 25 को सभी रेंजर को लिख चुकी है, कि किसी भी माली से वन रक्षक का काम न लिया जाए, लेकिन रेंजर लोगों को कमीशन प्यारा लगता है, उनके लिए प्रमुख सचिव और डीएफओ के आदेश और निर्देष का कोई मतलब नहीं।

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जिसने ‘भ्रष्टाचार’ का ‘विरोध’ किया, उसे मिली ‘सजा’

वन विभाग के अधिकारी नहीं चाहते कि कोई उनके भ्रष्टाचार के मामले में टांग अड़ाए, अगर किसी ने विरोध करने का प्रयास किया तो उसे जिले से बाहर भेज दिया गया। कहने का मतलब जिस विभाग के जिम्मेदारों पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने का जिम्मा हैं, वही भ्रष्टाचारियों का सरगना बना हुआ है। इन अधिकारियों से ईमानदार तो वन दारोगा और वन रक्षक हैं, जो समय-समय पर भ्रष्टाचार का विरोध करते रहें, हालांकि ऐसे लोगों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती है। विरोध करने का खामियाजा अब तक तीन वन दरोगा दो वन रक्षक, एक माली और एक बाबू को भुगतना पड़ा। सवाल उठ रहा है, कि आखिर सबसे अधिक फर्जीवाड़ा रामनगर रेंज में ही क्यों हो रहा है? एसडीओ जिसकी जिम्म्ेदारी मानिटरिगं और निरीक्षण की रहती है, वह भी अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते, अगर निभाते तो पौध उगान और पोैधरोपण में फर्जीवाड़ा न होता।