बस्ती। ऐसा लगता है, कि मानो 100 बेड एमजीएच अस्पताल हर्रैया में प्रशासनिक व्यवस्था की बागडोर सीएमएस के हाथ में न हो कर फार्मासिस्टों और बाबूओं के हाथ में हो। तभी तो फार्मासिस्ट दवा वितरण काउंटर पर सरकारी पर्ची पर मरीज देखता और दवा भी लिखता। सवाल उठ रहा है, कि जिस फार्मासिस्ट का काम मरीजों को दवा देना हो, अगर वह मरीज को देखता है, और बाहर की दवा लिखता है, तो जाहिर सी बात फार्मासिस्ट अपने दायित्वों का निवर्हन नहीं बल्कि निजी लाभ के लिए वह मरीज भी देखता और दवा भी लिखता, वह भी सरकारी पर्ची पर। माना जाता है, कि जो बाहर की दवांए लिखी जाती होगी, उसमें भारी कमीषन भी मिलता होगा, क्यों कि जब सरकारी डाक्टर को कमीशन मिल सकता है, तो फार्मासिस्ट को क्यों नहीं? यह कमीशन ही है, जो अस्पताल के सीएमएस से लेकर डाक्टर, और बाबू से लेकर फार्मासिस्ट तक नियम विरुद्व काम करते है। सवाल उठ रहा है, कि जो मूल काम फार्मासिस्ट का है, उससे इतर यह क्यों कर रहे हैं? और सीएमएस क्यों इन लोगों को करने दे रही हैं? क्यों नहीं ऐसे फार्मासिस्ट पर सीएमएस रोक लगाती या कार्रवाई करती जो दवा वितरण काउंटर पर मरीजों को सिर्फ देखता ही नहीं बल्कि पर्ची पर बाहर की दवा भी लिखता? आखिर ऐसे फार्मासिस्ट को यह नियम विरुद्व अधिकार दिया किसने? इससे सीएमएस के लचर प्रशासनिक व्यवस्था का पता चलता है। वरना, किसी फार्मासिस्ट की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वह नियम विरुद्व मरीजों को देखे और दवा भी लिखे। कहा भी जाता है, जब किसी अस्पताल की प्रशासनिक व्यवस्था लचर होती है, तो उसका लाभ अस्पताल वाले ही उठाते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो दो लैब की तरह दो दवा का स्टोर न होता। यहां पर भी सवाल उठ रहा है, कि जिले भर के सरकारी अस्पतालों में दवा का सिर्फ एक ही स्टोर है, तो फिर हर्रैया में दो क्यों? एक दवा स्टोर फार्मासिस्ट के कब्जे में क्यों? अगर किसी फार्मासिस्ट के पास अन्य एक दवा का स्टोर रहता है, तो उससे दवाओं के दुरुपयोग होने की संभावना बनी रहती है। वरना दो दवा स्टोर नहीं होता। सीएमएस को चाहिए कि पहले वह दवा काउंटर पर मरीज को देखने और सरकारी पर्ची पर दवा लिखने वाले और अपनी कस्टडी में दवा स्टोर रखने वाले फार्मासिस्ट के खिलाफ कार्रवाई करें, या फिर दवा काउंटर पर किसी अन्य फार्मासिस्ट को लगाएं, एक ही दवा काउंटर पर पिछले तीन सालों से अधिक समय से तीन फार्मासिस्ट का होना अपने आप में बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है। अस्पताल की अंदरुनी बातें जो निकलकर मीडिया के पास जा रही है, उसके लिए सबसे बड़ा कारण तीनों फार्मासिस्ट का इतने दिनों से एक ही काउंटर पर रहना माना जा रहा है। कहा जा रहा है, कि क्यों एक दो लोगों को ही मलाई खाने का मौका दिया जा रहा है? क्यों नहीं अन्य को यह मौका दिया जा रहा है।

लचर प्रशासनिक व्यवस्था का पता इस बात से भी चलता है, कि इस अस्पताल में छह फार्मासिस्ट कार्यरत हैं, लेकिन इनमें शायद ही कोई दो बजे के बाद अस्पताल में दिखाई देता हो, मान लीजिए कि अगर किसी मरीज को एमरजेंसी में किसी दवा की आवष्यकता पड़ गई, तो उसे दवा कौन देगा? दवा देने वाला फार्मासिस्ट तो अस्पताल के बाहर या तो मेडिकल स्टोर वालों से अपने कमीषन का हिसाब-किताब कर रहा होगा या फिर घर जा चुका होगा, ऐसे में मजबूरी में मरीज को बाहर से ही दवाएं खरीदनी पड़ेगी। अगर अस्पताल की ऐसी व्यवस्था हैं, तो इसे किसी भी दषा में आईडिएल नहीं कहा जा सकता। इससे पता चलता हैं, कि सीएमएस का अपने ही स्टाफ पर कोई नियंत्रण नहीं रहा, यह तभी होता है, जब किसी सीएमएस की गिनती भ्रष्ट अधिकारियों में होती है। वैसे भी उच्चीकरण और दो लैब के मामले में सीएमएस जांच के घेरे में आ चुकी है, इन पर कभी भी कार्रवाई की बिजली गिर सकती हैं, तबादला से लेकर सस्पेंषन तक की कार्रवाई हो सकती है, ऐसे में जो कोई नया सीएमएस आएगा, उसे एक अच्छी व्यवस्था के बजाए ऐसी दूषित व्यवस्था मिलेगी, जिसे सुधारने में कई साल लग जाएगें, पता चलेगा कि तब तक सीएमएस का तबादला हो गया। बार-बार कहा जा रहा है, हर्रैया महिला अस्पताल की व्यवस्था को खराब करने में सीएमएस, बाबू और फार्मासिस्ट का तो रोल रहा ही, नेताओं और पत्रकारों का भी रहा। जिस दिन पत्रकार बंजरग प्रसाद जैसे भ्रष्ट बाबू से लिफाफा लेना बंद कर देगें, उस दिन अस्पताल की व्यवस्था में तो सुधार होगा ही साथ ही पत्रकारों की छवि में भी सुधार देखने को मिलेगा। देखना है, कि इसमें कितने पत्रकार भाई छवि सुधारने में कितना सफल होते है।