बस्ती। अगर इंसान दो चीजों पर मंथन कर ले, तो कभी मुसिबत में पड़ ही नहीं सकता। पहले कभी दूसरे के लिए गढढ़ा मत खोदिए, नहीं तो खुद गिर जाएगें, और दूसरा अगर किसी का घर शीशे का है, तो उसे दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेकना चाहिए। यह दोनों कहावत नहीं बल्कि एक ऐसी सच्चाई हैं, जिसे आदमी जल्दी स्वीकारता नहीं, लेकिन जिसने भी इसे स्वीकार कर लिया, यकीन मानिए, वह सुखी रहा। यह दोनों बातें इस लिए कहने की आवष्यकता पड़ गई, क्योंकि दोनों कहावत सच साबित हुई। कहने का मतलब पीडब्लूडी के अधीक्षण अभियंता कार्यालय में पिछले 16 साल से टेंडर बाबू का पटल देख रहे प्रभात कुमार उर्फ पटटू ने एक नेता के साथ मिलकर इसी कार्यालय के प्रशासनिक अधिकारी प्रेमचंद्र के खिलाफ इन्हें हटाने की साजिष रची। इसके लिए अपना दल के प्रदेश सचिव संजय सिंह पगार ने इनके खिलाफ एक शिकायत किया, जिसमें एक ही जिले में 27 साल तक रहने और अकूत संपत्ति एकत्रित करने का आरोप लगाते हुए तबादला और जांच कराने की मांग की। यह शिकायत इस लिए की गई, क्यों कि नेता से ठेकेदार बने को लगा कि उनका टेंडर प्रेमचंद्र के कारण निरस्त हुआ, जिसके चलते लाखों का घाटा हो गया, पटटू को भी यह लगा कि उनका मलाईदार पटल प्रेमचंद्र के कारण छीना गया। जाहिर सी बात हैं, कि जब एक व्यक्ति दो लोगों के नुकसान का कारण बनतें है, तो दोनों एक हो जाते हैं। संजय सिंह पगार की ओर से जो शिकायत हुई, उसे सही मानते हुए चीफ इंजीनियर ने दबाव में आकर शासन को यह लिखकर दे दिया कि प्रेमचंद्र का कार्यकाल 27 साल का हो गया, इस लिए इनका तबादला कर दिया जाए, लेकिन जब पत्र शासन में गया तो षासन वालों ने यह देखा कि अभी तो प्रेमचंद्र एक साल पहले गोरखपुर से तबादला होकर बस्ती आए हैं, तो कैसे 27 साल हो गया। चीफ इंजीनियर के लिखने के बाद जब तबादला नहीं हुआ तो फिर लिखा, फिर भी नहीं हुआ तो तीसरी बार लिखा। बार-बार लिखने का नतीजा यह हुआ कि शासन ने तबादले वाली पत्रावली को ही क्लोज कर दिया। रही बात प्रेमचंद्र पर लगाए गए अन्य आरोपों की तो उसके बारे में चीफ इंजीनियर ने लिखकर दे दिया, कि जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं होती। इसका मतलब यह हुआ कि प्रेमचंद्र के खिलाफ जो भी साजिश रची गई, और जो भी आरोप लगाए गए, उनसे प्रेमचंद्र एक तरह से बरी हो गए। अब आ जाइए प्रेमचंद्र के लिए गढढा खोदने वाले पटटू बाबू की तो, इनके खिलाफ ठेकेदार संघ ने जो शिकायत की गई, उसकी जांच शुरु हो गई, इन्हें लखनउ तलब किया गया, दो दिन तक यह लखनउ में रहे, और कार्रवाई न हो, इसके लिए प्रयास करते हैं, चूंकि इनके खिलाफ जो आरोप लगाए गए, वे साक्ष्य के साथ लगाए, जैसे इनके भाई का ठेकेदारी में पंजीकरण होना, पत्नी के नाम दो स्थानों पर करोड़ से उपर की जमीन खरीदना और उसे मानव संप्रदा के पोर्टल पर प्रदर्षित न करना और बिना सरकार के अनुमति के न्यूजीलेैंड में पढ़ रहे बच्चों से मिलने जाना रहा। ध्यान देने वाली बात यह है, कि जो आरोप प्रेमचंद्र पर लगाए गए, वे सभी गलत पाए गए, और जो आप पटटू पर लगाए गए, वे सभी सही पाए गए। सवाल उठ रहा है, प्रेमचंद्र तो बरी हो गए, लेकिन पटटू का क्या होगा? इसी लिए कहा जाता है, कि जो दूसरों के लिए गढढ़ा खोदता है, एक दिन वह खुद ही उस गढढ़े में गिर जाता है, और जो लोग शीशे के घर में तो रहते हैं, वे दूसरों के घरों में पत्थर नहीं फेका करतें। दोनों कहावत पटटू के मामले में सही साबित होती है।
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