बस्ती। वर्तमान राजनीति के परिवेश में एक सवाल बड़ी जोर-शोर से उठ रहा है, कि क्या कोई ईमानदार छवि वाला नेता इस परिवेश में कभी संसद या विधानसभा में जा पाएगें या नहीं? जबाव मिलता है, कि ‘सांसद’ और ‘विधायक’ बनना तो बहुत दूर की बात, ‘प्रधान’ तक ‘नहीं’ बन ‘पाएगें’। क्यों कि इनके पास चोरी और बेईमानी से कमाया गया अकूत धन नहीं हैं, लेकिन इनके पास जिंदगीभर की कमाई ईमानदारी नामक पूंजी अवष्य है। यह अजीब बिडंबना है, कि ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति की कमर एक चुनाव के हारते ही टूट जाती है, और वहीं पर एक बेईमान और चोर किस्म की कमर तीन-चार चुनाव हारने के बाद भी टूटने को कौन कहें, झुकती तक नहीं, और वह चौथा-पांचवा चुनाव लड़ने की तैयारी में जुट जाता है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि आखिर जनता ईमानदार छवि वाले को अपना नेता क्यों नहीं चुनती? क्यों वह चोर और बेईमान को अपना नेता चुनती है? क्या जनता को भी चोर और बेईमान किस्म का नेता चाहिए?
कहा भी जाता है, कि वर्तमान राजनीति परिवेश में चुनाव लड़ने वाले नेताओं के पास धन ही होना काफी नहीं होता, बल्कि उसे अकूत धन का मालिक भी होना चाहिए। धन भी ऐसा होना चाहिए, जो ईमानदारी और मेहनत का न हो, ताकि चुनाव हारने के बाद उसकी कमर न टूटे और वह दुबारा खड़ा हो सकें। अगर किसी के पास चोरी बेईमानी, मक्कारी और ठगहरी का पैसा होगा, और वह चुनाव हार भी जाता है, तो उसे कोई अफसोस भी नहीं होता, क्यों कि उसका जो पैसा डूबा वह बेईमानी और चोरी का डूबा। अगर ऐसे नेताओं का 10-20 करोड़ चुनाव में खर्च भी हो जाता तो उनके सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। जिले में एक दो ऐसे नेता भी हैं, जो कई चुनाव हार चुके, और उन्हें लगता ही नहीं, कि इन चुनावों में उनका कितना धन चला गया, ऐसे लोग एक-दो बार विधायक या फिर मंत्री क्या बन जातें हैं, उनके पास इतना धन आ जाता है, कि वह पांच दस चुनाव लड़ने की हैसियत में रहते है। लोगों की समझ में ही नहीं आता कि आखिर इन्होंने इतना धन कमाया/बनाया कैसे और कहां से? ऐसा लगता है, कि मानो इनके पास कोई कुबेर का खजाना हो। सवाल उठ रहा है, और जनता, जानना चाहती है, कि क्या नेता इतने भ्रष्ट होते हैं, कि उनके पास इतना धन आ जाता है, कि अगर 50-60 करोड़ चुनाव में खर्च भी हो जाए तो उनके चेहरे में सिकन तक नहीं आती। वहीं पर अगर हम अम्बिका सिंह, राजमणि पांडेय राम जियावन जैसे ईमानदार और स्वच्छ छवि के नेता की बात करें, तो इन लोगों का जीवन यापन पेंशन से चलता है। न जाने क्यों जनता ऐसे नेताओं को अस्वीकार कर देती है, और भ्रष्ट नेताओं को गले लगाती है। इन लोगों ने अपनी छवि और ईमानदारी के बल पर विधायक बन कर पुनः जनता की सेवा करना चाहा, चुनाव भी लड़ा, लेकिन जनता ने इन्हें अस्वीकार कर दिया, बेईमान के सामने ईमानदार की जमानत तक जब्त करवा दी। इन लोगों के पास जो रही सही पूंजी थी, वह भी चुनाव में चली गई। यह है, जिले के ईमानदार और स्वच्छ छवि के नेताओं का सच, जिन्हें अगर किसी काम से बाहर जाना होता हैं, या फिर न्यौता हकारी करनी होती है, तो वह किसी मित्र के चार पहिया वाहन का इंतजार करते हैं, इनके पास इतना पैसा भी नहीं रहता कि यह अपने वाहन में तेेल भरवा सकें। पूर्व विधायक राम जियावन को आज भी पुराने स्कूटर से चलते हुए देखा जा सकता है, राजमणि पांडेय जैसा ईमानदार और तेजतर्रार पूर्व विधायक के पास तो स्कूटर तक नहीं, इन्हें जब भी न्याय मार्ग पर आना होता है, तो यह टैंपो या फिर किसी की बाइक से आ जाते है। रही बात पूर्व विधायक अम्बिका सिंह की तो इनके जैसा नेता मिलना मुस्किल है। पार्टी के प्रति अगर किसी को वफादरी सिखनी हो तो इनसे सीख सकता है। इनमें कोई संसद तो कोई विधानसभा में जाने के लिए कई बार किस्मत आजमा चुके हैं, लेकिन जनता ने साथ नहीं दिया। जनता और समाज ऐसे नेताओं का तो खूब सम्मान करती है, लेकिन वोट नहीं देती। वोट उसे देती है, जो पैसा, दारु, मुर्गा खिलाता है। यह एक ऐसी सच्चाई हैं, जिसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि जनता है। सवाल उठ रहा है, कि क्यों जनता को ईमानदार नहीं बल्कि भ्रष्ट नेता चाहिए? जनता ईमानदार छवि वाले नेताओं को क्यों नहीं सांसद और विधायक बनाती? क्यों ऐसे बेईमान और चोर नेताओं को बनाती? जो फारचूनर, डिफेंडर, लैंड कू्रजर एवं अन्य मंहगी गाड़ियों से घूम रहे है। यह लोग गाड़ी से कम और जहाज से अधिक चलते है। पार्टियां भी राजकिशोर सिंह जैसे लोगों का स्वागत करती, और राजमणि पांडेय, राम जियावन और अंम्बिका सिंह जैसे लोगों को पूछती ही नहीं। उन्हें पूछती है, जो पार्टी फंड में चार-पांच करोड़ चंदा दे सकें, अगर ऐसा नहीं होता तो आज नगर पंचायत गायघाट के अध्यक्ष की कुर्सी पर नेताजी का चालक नहीं बल्कि ‘रविंद्र गौतम’ जैसा ‘भाजपा’ का खाटी ‘कार्यकर्त्ता’ बैठता।
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