बस्ती। जो साहब और ठेकेदार गरीब मरीजों का अंडा, मटन, दूध, ब्रेड और भोजन खा रहे हैं, उन्हें शायद यह नहीं मालूम कि वह पैसे के लालच में कितना बड़ा पाप कर रहे है। जाहिर सी बात हैं, कि जो साहब और ठेकेदार मरीजों के भोजन को मारकर अपने परिवार को खिलाएगा, उस परिवार का क्या होगा? इसका अंदाजा भी उन्हें नहीं होगा। तभी तो टीबी अस्पताल के मरीज ने कहा कि अगर कोई साहब और ठेकेदार उसके हिस्से का अंडा और मटन खाएगें तो उन्हें नर्क में जाना पड़ेगा। अगर किसी साहब या ठेकेदार के पुत्र और पुत्री को यह पता चल जाए, कि उसके पापा तो मरीजों के भोजन पर डांका डालकर उन्हें खिला रहे हैं, यकीन मानिए, उस दिन पिता को अपने ही पुत्र और पुत्री के सामने इतनी शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी कि नजर नहीं मिला पाएगे। कहा भी जाता है, कोई भी भ्रष्टाचार करिए सरकारी धन को लूटिए, उतना पाप नहीं लगेगा, जितना गरीब मरीजों के भोजन में भ्रष्टाचार करने से लगेगा। चूंकि साहबों और ठेकेदारों के भीतर इतना लालच समा गया है, कि उन्हें यह एहसास ही नहीं होता कि वह मरीजों के भोजन का हक मार कर कितने बड़े पाप के भागीदारी बन रहे है।

आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि सरकारी अस्पतालों में भर्ती गरीब मरीज के भोजन के नाम पर बहुत ही डर्टी गेम हो रहा है। मरीजों को गुणवत्ताविहीन भोजन देने और कम मात्रा में देने की तो बहुत घटनाएं सुनी होगी, लेकिन मरीज और उसके तीमारदारों के नाम पर किस तरह का खेल ठेकेदार और वार्डेन मिलकर कर रहे हैं, उसे सोचकर ही षर्म आती है। अस्पताल चाहें टीबी का हो, जिला अस्पताल हो या महिला अस्पताल या फिर पीएचसी सीएचसी ही क्यों न हो, सभी में भोजन के नाम पर खेल हो रहा है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि अगर किसी मरीज को गुणवत्तापरक और भरपेट भोजन नहीं मिलेगा, तो उस मरीज का क्या होगा? मरीज के तीमारदारों को पता ही नहीं होता कि सरकार उनके भोजन और नाष्ता के लिए भी पैसा देती है। यह भी सही है, कि एक मरीज पर सरकार जितना पैसा देती है, उतने में कमीषन और गुणवत्तापरक एवं भरपेट भोजन नहीं दिया जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि जब हर ठेकेदार जानता है, तो फिर क्यों मरीजों की बददुआएं लेता है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि क्या 90 रुपये में मरीजों और उनके तीमारदारों को दो समय का भोजन, ब्रेड और दूध दिया जा सकता है। जबाव न में ही होगा। 35 रुपया का दूध, दस रुपये का ब्रेड, 50 रुपया भोजन और लेबर कास्ट अलग से, इस तरह एक मरीज पर ठेकेदार का 100 रुपये से अधिक खर्च आता है। मिला उसे कितना 90 रुपया, इसके बाद साहब को कमीषन भी देना हैं, और अपने लिए लाभांश भी रखना है। इस तरह कुल मिलाकर एक मरीज पर ठेकेदार का 120 रुपये से अधिक लग जाता है। इसका मतलब ठेकेदार को अगर 90 रुपया मिला और उसने 120 रुपया खर्च किया तो इसका मतलब यह हुआ कि ठेकेदार ने अपनी जेब से 30 रुपया लगाया, क्या कोई ठेकेदार ऐसा होगा कि जो 30 रुपया प्रति मरीज पर जेब से लगाकर मरीजों की सेवा करेगा। जो सच्चाई उभर कर सामने आ रही है, अगर उसे सच माना जाए तो ठेकेदार घाटे में नहीं बल्कि लाभ में रहता है। अगर किसी वार्ड में 40 मरीज भर्ती हैं, और उसके साथ 40 तीमारदार भी होगें, तो भोजन और नाष्ते के नाम पर 80 का ही बिल बनेगा। भुगतान भी 80 मरीजों के नाम पर होगा। कागजों में तो 80 मरीज/तीमारदार का बनता भी है, बिल भी 80 का बनता है, लेकिन आधे से अधिक मरीज और उनके तीमारदार अस्पताल का न तो भोजन करते है, और न नाष्ता। 40 मरीेजों का जो अतिरिक्त भुगतान हुआ। उसी में ठेकेदार चोरी करता है, साहब को कमीषन देता है। लेकिन चोरी तो चोरी है।