बस्ती। यह खुला रेट किसी और का नहीं, बल्कि डिप्टी सीएमओ एवं अल्टासाउंड और पैथालाजी का लाइसेंस जारी करने में रिपोर्ट लगाने वाले नोडल डा. एके चौधरी का है। जैसे ही इस ओपेन रेट की जानकारी भाकियू के भानु गुट के जिला उपाध्यक्ष उमेश गोस्वामी को हुई, वैसे ही यह डीएम के पास पहुंच गए, और लिखित शिकायत करते हुए इसकी मजिस्टेरिएल जांच कराने की मांग कर डाली। कहा कि मैडम, इनके द्वारा जितने भी लाइसेंस जारी करने के लिए रिपोर्ट लगाया गया, पहले उसकी जांच करा ली जाए, तब उसके बाद लाइसेंस जारी किया जाए। क्यों कि इन्होंने एक-एक व्यक्ति से ढ़ाई से तीन-तीन लाख लिया, इस तरह इन्होंने अनियमित रुप से लाइसेंस जारी करने का रिपोर्ट लगा दिया। सवाल करते हुए कहा कि मैडम जब पूरे जिले में ही आधा दर्जन रेडियोलाजिस्ट और पैथालाजिस्ट उपलब्ध हैं, तो कैसे डा. एके चौधरी ने एक दर्जन से अधिक लाइसेंस जारी करने का रिपोर्ट लगा दिया। कहा कि मैडम, इनकी देखरेख में जिले में पहले से ही अवैध तरीके से लगभग 100 से अधिक अल्टासाउंड और पैथालाजी सेंटर संचालित हो रहे हैं, और इन सेंटरों से इनकी हर माह की कमाई लगभग 15-20 लाख की होती है। शिकायतकर्त्ता का कहना है, कि डीएम मैडम ने इसकी जांच मजिस्टेट से कराने के आदेश दिए है। अगर किसी डिप्टी सीएमओ की कमाई हर माह 15-20 लाख होती है, तो इसका मतलब हर साल उसकी कमाई दो करोड़ से अधिक हो गई, और कहीं डिप्टी सीएमओ पांच-दस साल रह गए, तो उसकी कमाई 20 करोड़ से अधिक हो जाती है।

मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि अगर उमेश गोस्वामी जैसा दो-चार और शिकायतकर्त्ता हो जाए तो काफी हद तक भ्रष्टाचार पर लगाम लग सकता है। पता नहीं कहां वे शिकायतकर्त्ता गुम हो गए, जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ निरंतर वार किया। उमेश गोस्वामी को अगर छोड़ दिया जाए तो कोई अन्य ऐसा नहीं दिखाई देता जो भ्रष्टाचार के खिलाफ सामने आए। जो सामने आते भी हैं, तो वह बाद में समझौता कर लेते है। सवाल उठ रहा है, कि जब कोई शिकातकर्त्ता सामने आएगा नहीं तो फिर भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगा कैसे? भाजपा के एक नेता है, सुखराम गौड़, इन्होंने कमिष्नर साहब से षिकायत किया कि मेडिकल कालेज में 15 ऐसे कोरोना योद्वा के नाम पर नौकरी पर रख लिया, जिन्होंने एक दिन भी किसी सरकारी अस्पताल में कोरोना योद्वा की भूमिका को नहीं निभाया। मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल की ओर से डूडा को नोटिस दी गई, और पत्रावली तलब करने का आदेश हुआ, आज तक पत्रावली नहीं दी गई, क्यों कि प्रिंसिपल साहब से सख्त लहजे में कहा था, कि अगर एक भी नियुक्ति गलत हुई, तो कार्रवाई होगी। बाद में जब शिकायतकर्त्ता से पूछा गया कि भाई शिकायत का क्या हुआ? और क्यों आपने पैरवी करना छोड़ दिया, आप पर मैनेज होने का आरोप लग रहा है। कहने लगे कि लगन बहुत तेज है, लगन बाद पैरवी करुंगा। अब आप समझ हैं, कि जब भाजपा के एसटी मोर्चा के क्षेत्रीय अध्यक्ष का यह हाल हैं, तो किसी और के बारे में क्या कहा जा सकता है। जिस तरह भाजपा के पदाधिकारी शिकायत के नाम पर मैनेज हो रहे हैं, उससे वह तो नंगा हो ही रहे हैं, साथ ही पार्टी की भी बदनामी हो रही है। सुखराम गौड़ से अच्छा तो भाकियू के उमेश गोस्वामी हैं, जो कम से कम मैनेज तो नहीं होता। इस मैनेज के चक्कर में कईयों ने अपनी पहचान खो दी। मैनेज होने वालों को षायद यह नहीं मालूम कि समाज और मीडिया उन्हें देख रहा है। उमेश गोस्वामी की ईमानदारी को देखकर ही डीएम सम्मान देती है, और शिकायत पर जांच बैठाती है, यह अलग बात हैं, कि कार्रवाई और जांच का पता नहीं चलता। उमेश गोस्वामी ने उन शिकायतकर्त्तओं को बना दिया, कि अगर ईमानदारी से कोई शिकायत की गई हैं, तो उसका परिणाम अवष्य सामने आएगा। उमेश गोस्वामी के चलते ही पूरा सीएमओ कार्यालय परेशान और किसी तरह और किसी भी शर्त पर मैनेज करने को तैयार है।