बस्ती। आडिट जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने के मामले में अगर ब्राहृमण महासभा के राष्टीय अध्यक्ष पर सवाल उठ रहे हैं, तो यह बहुत ही चिंता का विषय है। कहा जा रहा है, कि क्या कारण है, कि रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में अध्यक्षजी असहज महसूस कर रहे हैं, असहज वही महसूस करता है, जिसे कुछ खोने का डर रहता या फिर अत्यधिक दबाव में रहता है। अध्यक्षजी को इससे क्या फर्क पड़ता है, कि आडिट रिपोर्ट में किसे दोशी माना गया और किसे नहीं, अगर किसी संस्था का अध्यक्ष एक जांच रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में असहज तहसूस करता है, तो ऐसे अध्यक्ष से और क्या उम्मीद की जा सकती है? अगर इसे लेकर अध्यक्षजी पर अंगुली उठ रही है, तो इसके लिए कोई और नहीं बल्कि खुद अध्यक्षजी ही जिम्मेदार है। लोग तो यह तक कहने लगें हैं, कि क्या रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए सिफारिश करनी पड़ेगी। ऐसे समय में अध्यक्षजी को अपने दायित्वों का निवर्हन करना चाहिए। सवाल यह उठ रहा है, कि अगर रिपोर्ट सार्वजनिक हो भी गया तो अध्यक्षजी का क्या बिगड़ जाएगा, लेकिन अगर समय से रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुआ तो अध्यक्षजी की छवि अवष्य खराब हो सकती है। कहा भी जा रहा है, कि सवाल रिपोर्ट का नहीं बल्कि विष्वास का है, सच को छिपाने या दबाने से विष्वास अर्जित नहीं किया जा सकता है, बल्कि सार्वजनिक करने से अर्जित किया जाता है। पारदर्षिता से प्रतिष्ठा घटती नहीं लेकिन संदेह की उम्र अवष्य घटती है। यह कितनी बिडंबना हैं, कि आडिट रिपोर्ट की जानकारी सिर्फ अध्यक्षजी को हैं, और किसी को नहीं, आडिट रिपोर्ट किसी की व्यक्तिगत जागीर बनकर नहीं रहनी चाहिए, क्यों कि इसमें सभी दानदाताओं का योगदान है। अगर सभी का योगदान है, तो क्यों उन लोगों को सच जानने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है? क्या कारण है, कि आडिट रिपोर्ट को सार्वजनिक करने में देरी की जा रही है? आखिर कौन से सच को दबाने का प्रयास हो रहा है? किसी ने लिखा भी कि ऐसा लगता है, कि अध्यक्षजी पर रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने का दबाव पड़ रहा है। आज नहीं कल तो सार्वजनिक करना ही पड़ेगा, अगर लोगों के रोश को ठंडा करना है, तो रिपोर्ट को सार्वजनिक करना ही होगा, क्यों कि अब लोगों का सब्र का बाध्ंा टूटने लगा है। अब लोगों को यह समझ में आने लगा हैं, कि क्यों नहीं 20 साल तक आडिट जांच कराया गया? क्यों इतने सालों तक कुछ लोगों को हजारों लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ करने दिया गया? कहा भी जा रहा है, कि आडिट रिपोर्ट से ही पता चलेगा कि महाघोटाला हुआ है, कि नहीं? भलाई इसी में हैं, कि विप्र जनमानस की श्रद्वा, आस्था और विष्वास के साथ खिलवाड़ न करके रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए। अगर रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया गया तो निष्चित ही विप्र आक्रोष ही अपनी सीमााओं को लांघ जाएगा। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब तक रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होगा, तो कैसे लोगों को यह पता चलेगा कि कौन चंदा चोर है, और कौन नहीं? इन सबका जबाव वह रिपोर्ट हैं, जिसे अब तक सार्वजनिक लहीं किया गया। रिपोर्ट सार्वजनिक न होना यह साबित करता है, कि जो भी आरोप महामंत्री और कोशाध्यक्ष पर लगाए गए, वे सही है।
- Loading weather...
- |
- Last Update 02 Oct, 03:47 AM
- |
- |
- खबरें हटके
- |
- ताज़ा खबर
- |
- क्राइम
- |
- वायरल विडिओ
- |
- वीडियो
- |
- + More
0 Comment