बस्ती। राज्य निर्वाचन आयोग और प्रशासन के सामने फेयर पंचायत चुनाव कराना हमेशा से चुनौती रहा। पंचायत चुनाव से पहले प्रषासन की ओर से पारदर्शी चुनाव कराने के दावे किए जाते रहें हैं, लेकिन जब मतदाता सूची का अंतिम प्रकाशन होता है, तो प्रशासन के सारे दावों की हवा निकल जाती है। विधानसभा से अधिक मतदाता पंचायत में होते हैं, और यह अंतर हजार दो हजार वोट का नहीं रहता, बल्कि लाखों का रहता है। इस बार भी जब पंचायत चुनाव होगा, तो उसमें तीन लाख से अधिक फर्जी मतदाता मतदान करेगें। सवाल उठता है, कि इतनी बड़ी संख्या फर्जी मतदाता कहां से आ जाते हैं, और कैसे इन लोगों का नाम एसडीएम साहब लोग की ओर से मतदाजा सूची में जोड़ दिया जाता है? अगर हम जिलेभर के विधानसभा के मतदाताओं पर नजर डालते हैं, तो लगभग 17.50 लाख होती है, लेकिन जब वहीं पर पंचायत चुनाव के मतदाता सूवी को देखते हैं, तो यह संख्या बढ़कर 20.70 लाख पहुंच जाती है। यानि 3.20 लाख फर्जी मतदाता सामने आते है। यही वह फर्जी मतदाता होते हैं, जिनके सहारे कोई जिला पंचायत अध्यक्ष बनता, कोई ब्लाक प्रमुख तो कोई प्रधान बनते है। जिले के 80 फीसद ऐसे लोग हैं, जो पंचायत चुनाव से पहले फर्जी वोटर बनाने की रणनीति बनाते है। इनमें अधिकतर वे लोग होते हैं, जो प्रधान, जिला पंचायत अध्यक्ष, जिला पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत अध्यक्ष और प्रधान बनना चाहते है। जो वर्तमान जनप्रतिनिधि होते हैं, वही सबसे अधिक फर्जी वोट बनाते हैं, चंूकि इन लोगों ने फर्जीवाड़ा के जरिए इतना पैसा कमा लेते हैं, कि इन्हें बीएलओ, सुपरवाइजर और एसडीएम को खरीदने में कोई दिक्कत नहीं होती, ऐसे लोगों के विरोध में चुनाव लड़ने वाले लोग शिकायत पर षिकायत करते रहते हैं, लेकिन एसडीएम स्तर पर शिकायतों का निस्तारण इस लिए नहीं होता कि फर्जी वोट बनाने वाले पूरे तहसील को खरीद जो लेते है। अब हर कोई विक्रमजोत ब्लॉक के ग्राम पंचायत इमिलिया के राम आशीष सिंह पुत्र योगेंद्र बहादुर सिंह तो हो नहीं सकते कि लगभग 200 फर्जी वोट को कटवाने के लिए हाईकोर्ट चला जाए, अगर यह हाईकोर्ट नहीं गए होते तो 43 फर्जी वोट मतदाता सूची से नहीं काटे जाते। जिस तरह पैसे के बल पर फर्जी वोट बनाने के लिए बीएलओ, सुपरवाइजर और सहायक रजिस्टेशन अधिकारियों को खरीदे उससे पूरे चुनाव प्रक्रिया पर प्रष्नचिन्हृ लग गया। कहने का मतलब जिसके पास पैसा हैं, वह फर्जी वोट बनवा सकता है, और जिसके पास नहीं हैं, वह शिकायत कर रह जाता है। बहुत कम ऐसे बीएलओ, सुपरवाइजर और एसडीएम होगें, जो मतदाता सूची को लेकर संवेदनशील होगें। अधिकांश लोग पंचायत चुनाव को पैसा कमाने का एक अवसर मानते हैं, और यह लोग यह सोचकर फर्जीवाड़ा करते हैं, कि फिर कभी फर्जीवाड़ा करने का मौका मिलेगा, भी कि नहीं? अब जरा अंदाजा लगाइए कि जो व्यक्ति फर्जी वोटर्स के जरिए चुनाव जीतेगा, क्या वह व्यक्ति ग्राम पंचायत और गांव वालों के प्रति ईमानदार होगा, बल्कि जितना जीतने में लगाया, उसका कई गुना वसूलेगा। आज जिसके पास पैसा है, वही प्रधान, प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठ सकता है। जो धनबलि लोग आरक्षण के चलते चुनाव नहीं लड़ सकते वे अपने मनई तनई को लड़ाते है, और जब उनका आदमी चुनाव जीत जाता है, तो वह सिर्फ जीत का प्रमाण-पत्र लेने जाता है, बाकी पांच साल असली कहां गए, किसी को दिखाई ही नहीं देगें। जिस तरह पैसे के बल पर ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत खरीदे और बेचे जा रहे हैं, उसने भ्रष्टाचार को जन्म दिया। कभी जिला पंचायत सदस्य बिकते हैं, तो कभी क्षेत्र पंचायत सदस्य अपनी बोली लगाते है। बिकने वाले लोग भी यह सोचकर अपनी बोली लगाते हैं, कि अब बोली लगाने के लिए पांच साल बाद मौका मिलेगा, मौका मिलेगा कि नहीं? बार-बार बिकने वाले जिला पंचायत सदस्यों को कौन भूल सकता है, यह लोग पांच साल में इतनी बार बिकेगें होगें, कि इन्हें याद भी नहीं होगा, कब कितने में उनकी बोली लगी। जो असली और नकली जिला पंचायत सदस्यों ने बिकने का रिकार्ड बनाया, उन्हीं में से कई ऐसे हैं, जो जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी पर नजर गढ़ाए है। क्षेत्र पंचायत सदस्य को तो पांच साल में एक बार बिकने का मौका मिलता है, लेकिन जिला पंचायत सदस्य तो साल में कई बार बिक चुके है। कहा भी जाता है, कि अगर अध्यक्ष ईमानदार होता तो जिला पंचायत नहीं बिकता।