बस्ती। मजदूर दिवस पर डा. वीके वर्मा कहते हैं, कि सच तो यह है, कि हर साल पहली मई के दिन को मजदूर दिवस के रुप में मनाया जाता है, लेकिन आज तक यह समझ में नहीं आया कि आखिर यह मजदूर दिवस मनाया क्यों जाता है? क्यों कि जब मजदूरों की स्थित नहीं सुधर रही है, तो ऐसे मजदूर दिवस मनाने से क्या फायदा? मजदूर दिवस के दिन भी मजदूर मंडी में मजदूर किसी मालिक का इस लिए इंतजार करता है, ताकि वह आएगा और उसे ले जाएगा और शाम को पांच सौ रुपया मजदूरी देगा। इस मजदूरी का इंतजार उसका परिवार भी यह सोचकर करता है, कि तब मजदूरी का पैसा आएगा तो घर का चूल्हा जलेगा, जिस दिन मजदूरों को कोई काम नहीं मिलता उस दिन उसके घर में चूल्हा नहीं जलता। फिर ऐसे मजदूर दिवस मनाने से क्या फायदा, कि मजदूर के घर में चूल्हा ही न जले। देखा जाए तो हर वर्ग ने तरक्की किया, लेकिन मजदूर आज भी मजदूर बना हुआ है। दूसरों के लिए महल खड़ा करने वाला मजदूर अपने लिए झोपड़ी का घर तक नहीं बना पाता। जब भी कभी मजदूर मंडी में जाने का मौका मिलता है, तो मजदूरों को देखकर तकलीफ होती है, जो मजदूर बुजुर्ग हो गए, उन्हें कोई नहीं पूछता, आधे दाम पर भी इन्हें कोई काम के लिए नहीं ले जाता है। एक मजदूर जीवनभर मजदूर ही रह जाता है, कभी वह मालिक नहीं बन पाता। जबकि सबसे अधिक श्रम मजदूर ही करता है। डा. साहब ने कविता के जरिए मजदूरों का दर्द बयां किया। कहा कि मजदूरों पर तरस न खाते। फिर क्यों इनका दिवस मनाते। मेहनत से ये करते काम। लीन कर्म में आठों याम। मेहनत से करते मजदूरी, इनकी सुख से लम्बी दूरी। श्रम का नहीं उचित फल मिलता इनका चेहरा कभी न खिलता। करते हर पल श्रम से काम कभी नहीं करते आराम। रहता घर में सदा अंधेरा। आता सुख का नहीं सवेरा। पर मालिक भी इन्हें सताते। काम नहीं है इनके आते। केवल अपना काम चलाते। मजदूरों पर तरस न खाते। फिर क्यों इनका दिवस मनाते। तरह-तरह का ये श्रम करते। ये मालिक की पीड़ा हरते। पूरी करते हर फरमाइश। दो-दो कभी न करते बाइस। श्रमिक न होते देश न होता। पकड़ के सर हर प्राणी रोता। झोपड़ियों में वक्त बिताते पर मालिक का महल बनाते। इनका दर्द न होता दूर। खुशी नहीं मिलती भरपूर। नहीं दिहाड़ी पूरा पाते। मजदूरों पर तरस न खाते फिर क्यों इनका दिवस मनाते। इसी तरह अधिवक्ता आदिल खान ने भी कविता के जरिए मजदूर दिवस के दिन मजदूरों की पीड़ा का उड़ेला। कहा कि शुक्र कीजे मजदूर है वरना कण-कण से घर बनाता कौन। शुक्र कीजे किसान है वरना भूखे को फिर खिलाता कौन।राजनीति धन उगाही न होती फिर जाति धर्म पर लड़ाता कौन। सोच कर देखो मजदूर न होते। इस चमन को सजाता कौन। सरकारी अधिकारी न हो मेरा (मजदूर) हिस्सा खाता कौन? अगर देश में संविधान न हो हम (खाना बदोश) तक न्याय पहुंचता कौन? मजदूर अगर मजबूर ना होता तो अत्याचार सहता कौन? अगर हम हक की बात न करते हमें बताओ बॉगी कहता कौन?
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