बस्ती। थाना वाल्टरगंज के शिवकुमार यादव नामक एक ऐसा आशिक हैं, जिसने अपनी माशूका के लिए पहले फंासी लगाया, नहीं मरा, जहर खाया, नहीं मरा। खास बात यह है, कि आशिक और माशूका दोनों शादी शुदा है। कहने को भले ही दोनों यह कहें, कि हम दोनों एक दूसरे के लिए बने हैं, लेकिन ऐसा नहीं हैं, दोनों का मकसद हमविस्तर होना। अगर ऐसा नहीं होता तो पत्नी अपने पति को नहीं छोड़ती और यादवजी अपनी पत्नी को धोखा नहीं देते।  जब कभी आशिक अपने पत्नी के पास जाता तो मारे जलन के माशूका कभी बलात्कार तो कभी छेड़खानी के आरोप में एससीएसटी एक्ट के तहत आशिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा देती, डर के मारे फिर आशिक, माशूका के पास बिस्तर गर्म करने के लिए पत्नी को छोड़कर चला जाता, और जब पत्नी अपना असली रुप दिखाती तो फिर यादवजी पत्नी के पास आ जाते। पत्नी ने जब अधिक विरोध किया तो यादवजी अपनी माशूका को लेकर मुंबई चले जाते। जब आशिक को पता लगा कि उसकी माशूका पुराना केस खोलवाने के लिए कचहरी भाग दौड़ कर रही है, और उधर यादवजी की पत्नी बगावत पर उतर आई, तो यादवजी ने एक बार फिर जहर खाने का नाटक किया, जहर खाया और बच भी गए। लखनउ के डाक्टरों ने बचा लिया। इससे पहले भी यादवजी फंासी लगा लिया था, लेकिन वह बच गए। लोगों का कहना है, कि यादवजी फंासी लगाने और जहर खाने का नाटक कर रहे हैं, ताकि सबकुछ ठीक हो जाए। जो शादीशुदा प्रेमी और प्रेमिका प्यार में पागल होकर एक दूसरे के लिए जान देने की बातें करते हैं, असल में वह प्यार नहीं होता बल्कि वासना होता है। जो पत्नी अपने पति की नहीं हो सकी और जो पति अपनी पत्नी का नहीं हो सका, वह अन्य किसी का कैसे हो सकता है? ऐसे लोगों का अंत बुरा ही होता है। या तो माषूका मार देती है, या फिर आशिक मार देता है। इस तरह के रिष्ते कभी भी पवित्र नहीं हो सकते, पवित्र रिष्ता वही हो सकता है, जो अग्नि के सामने साते फेरे लिए जाते हैं, लेकिन अब तो वह भी पवित्र नहीं रह गया। कहीं पति, पत्नी को धोखा दे रहा है, तो कहीं पत्नियां बेवफा साबित हो रही है। जिस भी आशिक या माशूका ने गलत रिष्ते को जन्म दिया, समझो उसी दिन से दोनों की बर्बादी शुरु हो गई। जिस रिष्ते को समाज न स्वीकार करे, और जो रिष्ता अपनों को रुलाएं, वह कभी पाक-साफ नहीं हो सकता है। यादवजी ने अपनी पत्नी को इस लिए धोखा दिया, क्यों कि इन्हें अपनी पत्नी से अधिक खूबसूरत महिला मिल गई। खूबसूरत पत्नी ने इस लिए पति को छोड़ा क्यों कि वह आजादी और ऐशोआराम चाहती थी, जो उसका पति नहीं दे पा रहा था, इसी लिए कहा जाता है, कि सिर्फ मर्द ही खराब नहीं होते, औरतें भी खराब होती है। खासतौर से शादीशुदा वे औरतें जो खूबसूरती के चक्कर में पड़कर अपनी पति को छोड़ देती हैं, या फिर उनसे रिष्ता तोड़ लेती है। जो महिला अपने आशिक के खिलाफ बलात्कार और छेड़खानी का मुकदमा दर्ज करवा सकती है, वह महिला केैसे यादवजी की हो सकती है। कुछ महिलाओं को आषिक और पति बदलने का शोक होता है, और इसी चक्कर में कभी-कभी महिलाओं को अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ जाता है। इसी लिए कहा जाता है, कि किसी भी रिष्ते के प्रति वफादार बनिए, रिष्ता निभाना सीखिए। रिष्ता चाहें पति और पत्नी का हो या फिर चाहें दोस्ती का हो। आज बहुत कम लोग ऐसे मिलेगें, जो 50-60 से दोस्ती का रिष्ता निभाते आ रहे है। जिस तरह पति और पत्नी में विष्वास के संकट के चलते परिवार का बिखराव हो रहा है, उसी तरह लालच और पैसे ने दोस्ती को तार-तार कर दिया। जिस तरह आए दिन अनैतिक संबधों के चलते घटनाएं सामने आ रही है, अगर इसी तरह होता रहा है, तो सबसे अधिक खून पति और पत्नी के रिष्ते का ही होगा। यादवजी के गले की हडडी बनी खूबसूरत महिला जब भी कचहरी आती है, तो उसके चेहरे पर जरा सा भी अफसोस नहीं झलकता। जब लोगों को पता चलता है, कि यह वही षादीषुदा महिला है, जिसने अपने पति को छोड़कर इस लिए यादवजी को पकड़ा ताकि उसे घूमने फिरने की आजादी मिल सके, आजादी तो उसे यादवजी ने दिया भी, लेकिन इसी आजादी देने के चक्कर में यादवजी का हंसता खेलता परिवार बर्बाद होने के कगार पर है। हालत यह हो गई हैं, कि यादवजी न तो पत्नी और बच्चे के रहें और न माशूका के। फंासी लगाने और जहर खाते फिर रहे है।