बस्ती। जिस किसान का डीएचओ 42 लाख डुबो देगें, वह किसान आत्महत्या नहीं करेगा तो और क्या करेगा? बैंक से लोन लेकर अगर कोई किसान पाली हाउस के लिए इतनी बड़ी रकम जमा करता है, और तीन साल बाद भी उसे एक रुपये का लाभ नहीं होता, बल्कि बैंक का कर्ज चुकाने के लिए दूसरा लोन लेना पड़ता है, तो किसान कैसे जिंदा रहेगा? ऐसे में किसानों की आय दोगुना कैसे होगी? किसान और उसका परिवार कैसे समृद्धिशाली नबनेगा? इस सवाल का जबाव योगीजी को देना है। यह किसान विकास खंड कप्तानगंज के बढ़नी गांव का रहने वाला और इसका नाम आलोक रंजन वर्मा है। आज यह किसान अपने आप को देश का सबसे अभागा किसान महसूस कर रहा है। क्यों कि अगर इस किसान को पता होता कि सरकार योजना तो किसानों के लिए बनाती है, लेकिन उसका लाभ विभाग के अधिकारी और फर्मे उठाती हैं, तो वह कभी न बैंक से लोन लेकर पाली हाउस का सपना देखता। डीएचओ ने कहा कि 58 लाख के इस प्रोजेक्ट पर सरकार 29 लाख का अनुदान देगी, इसी लालच में किसान 42 लाख लगा चुका, रही 29 लाख के अनुदान की तो वह तब मिलेगा जब प्रोजेक्ट पूरा होगा, जो प्रोजेक्ट तीन साल में नहीं पूरा हुआ, वह कब पूरा होगा, यही सोच-सोचकर किसान और उसके परिवार की रातों की नींद हराम हो गई। परिवार को अनेकों संकट का सामना करना पड़ रहा है। सवाल उठ रहा है, कि जब डीएचओ ने ‘नैतिक एग्री नामक फर्म’ नामक कार्यदाई संस्था से लाखों कमीशन खा लिया तो निर्माण कहां से और कैसे पूरा होगा? यह सवाल बना हुआ है। जिस डीएचओ ने ‘नैतिक एग्री नामक फर्म’ की गांरटी ली थी, वही डीएचओ फर्म से भी बड़ा बेईमान निकले। फर्म ने किसान को विष्वास में लेकर लखनऊ वाला अपना कार्यालय भी दिखाया, लेकिन कुछ दिन बाद जब किसान पुनः लखनऊ गया, उसे सिर्फ फर्म का बोर्ड मिला, कार्यालय कई दिनों से बंद बताया गया। यानि डीएचओ और कार्यदाई संस्था दोनों बेईमान, एक ने सरकारी अधिकारी बनकर किसान को ठगा तो दूसरे ने कार्यदाई संस्था बनकर किसान को धोखा दिया। कहने का मतलब सभी ने किसान को धोखा दिया, जिसके चलते किसान का 42 लाख डुबता नजर आ रहा है। जिस किसान का 42 लाख लगा हो, और उसे तीन साल में एक रुपये का भी लाभ न मिला हो तो किसान उसे डूबा ही मानेगा।
देशभर में किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से चलाई जा रही एकीकृत बागवानी विकास मिशन पर उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद से गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। यहां एक किसान ने आरोप लगाया है कि पॉलीहाउस स्थापना में अनुदान का झांसा देकर उससे लाखों रुपये वसूले गए, लेकिन तीन साल बाद भी परियोजना अधूरी है और जिम्मेदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। किसान आलोक रंजन वर्मा का कहना है कि एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत वर्ष 2023 में उन्हें 4000 वर्ग मीटर क्षेत्र में हाईटेक पॉलीहाउस स्थापित करने के लिए योजना के तहत चुना गया। परियोजना की कुल लागत लगभग 58 लाख रुपये आंकी की गई, जिसमें 50 प्रतिशत अनुदान का आश्वासन दिया गया था। किसान के अनुसार, उद्यान विभाग की ओर से नैतिक एग्री नामक फर्म को कार्यदायी संस्था नियुक्त किया गया। आरोप है कि फर्म ने बैंक के माध्यम से अलग-अलग किस्तों में करीब 42 लाख रुपये वसूल लिए, लेकिन आज तक पॉलीहाउस का निर्माण पूरा नहीं किया गया। अब फर्म के प्रतिनिधि संपर्क में भी नहीं हैं। मामले में सबसे बड़ा सवाल विभागीय जवाबदेही को लेकर उठ रहा है। किसान का आरोप है कि उसने कई बार जिला उद्यान अधिकारी और मंडलीय स्तर के अधिकारियों से शिकायत की, लेकिन तीन साल में भी न तो जांच पूरी हुई और न ही फर्म के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई हुई। इससे विभाग और फर्म के बीच संभावित मिलीभगत की आशंका जताई जा रही है। पॉलीहाउस में जरबेरा जैसी व्यावसायिक फसल उगाने की तैयारी में किसान पहले ही भारी निवेश कर चुका है। खेत में गोबर की खाद, लगभग 50 क्विंटल नीम खली और अन्य पोशक तत्व डाले जा चुके हैं। अब निर्माण अधूरा होने के कारण खेती शुरू नहीं हो पा रही है, जबकि खेत में अत्यधिक खरपतवार उग आने से अतिरिक्त खर्च बढ़ गया है। किसान का कहना है कि जब तक फर्म द्वारा कार्य पूर्ण कर आधिकारिक रसीद नहीं दी जाती, तब तक अनुदान की राशि जारी नहीं होगी। ऐसे में उसकी पूरी पूंजी फंसी हुई है और आजीविका पर संकट गहरा गया है। उसके सामने आत्म हत्या करने के आलावा और कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा।
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