बस्ती। जाति के नाम पर जिस तरह नेता समाज में जहर बो रहे हैं, उसे लेकर नौजवानों में अच्छा खासा रोश और विरोध है। कहते हैं, कि जब किसी मरीज को खून की आवष्यकता पड़ती है, तो क्या मरीज का परिवार जाति देखकर खून लाता है। जिस दिन इतनी छोटी सी बात लोगों के समझ में आ जाएगी, उस न दिन जाति का नफरत फैलाने वालों को जनता अच्छे तरीके से सबक सिखा देगी। आजादी के बाद चंद्रेष प्रताप सिंह जैसे अनेक नौजवानों का कहना है, कि हमने सपना देखा था जनता का राज, जनता के लिए। पर 78 साल बाद संसद और विधानसभाओं की कुर्सियां देख रहें हैं। वहां जनसेवक कम, सौदागर ज्यादा बैठे हैं। सौदा क्या? आपके वोट का। कीमत क्या? आपका भविष्य। प्राथमिकता देश नहीं, कुर्सी हो गई, किसान का बेटा आत्महत्या कर रहा है, युवा बेरोजगारी से जूझ रहा है, अस्पताल में दवा नहीं। तो फिर विधानसभा में बहस किस पर? किसका विधायक टूटेगा, किसकी सरकार गिरेगी। सरकार का बजट फाइल खोलो। विकास के नाम पर होर्डिंग, सुरक्षा के नाम पर सिक्योरिटी, देश के नाम पर भाषण। लेकिन असली फाइल तो कुर्सी बचाओ मिशन की चल रही है। जनता की सुरक्षा बाद में, विधायक की सुरक्षा पहले। देश का विकास बाद में, अगला चुनाव पहले। यही नई प्राथमिकता है। सौदागरों का बाजार जाति ़ मुफ्तखोरी’ ये सौदागर सड़क नहीं बनाते, दिमाग बनाते हैं। कैसे? जाति का जहर घोलकर। वोट मांगते समय तुम ठाकुर हो, तुम यादव हो, तुम दलित हो। पर अस्पताल में जब भर्ती होते हैं तो डॉक्टर सिर्फ मरीज देखता है, जाति नहीं। फिर मुफ्तखोरी का लॉलीपॉप। बिजली मुफ्त, पानी मुफ्त, राशन मुफ्त, बस मुफ्त। चुनाव से 6 महीने पहले खजाना खुल जाता है। जनता खुश होकर ताली बजाती है। पर कोई नहीं पूछता ये पैसा आया कहां से? आपके टैक्स से। आपका ही पैसा, आपको ही लॉलीपॉप बनाकर वापस हो रहा। आप कर्ज में डूबते देश का हिसाब भूल जाते हो। मुफ्त से आदत बिगड़ती है, हुनर नहीं बढ़ता। मछली पकड़ना मत सिखाओ, रोज मछली दे दो ये नीति देश को भिखारी बना देगी। जनता दुर्भाग्य की लेखिका खुद’ सबसे बड़ा दर्द ये है। सौदागर तो सौदा करेंगे ही, ये उनका धंधा है। पर हम? हम पांच साल में एक दिन वोट डालकर पांच साल गाली देते हैं। हम जाति देखकर वोट देते हैं, काम देखकर नहीं। जो नेता स्कूल नहीं बनवा पाया, उसे अपना वाला कहकर जिता देते हैं। फिर पांच साल बाद कहते हैं सिस्टम खराब है। अरे सिस्टम तुमने ही चुना था भाई। हमारा दिमागी चक्षु बंद है। बौद्धिक क्षमता का मतलब व्हाट्सएप फॉरवर्ड से आगे नहीं गया। सौदागर टीवी पर नारा देता, हम नारे में बह जाते हैं। वो कहेगा मुफ्त लो हम लाइन में लग जाएंगे। कोई नहीं पूछेगा कल क्या खाएंगे जब खजाना खाली होगा? अबके नेता व्यवसाई हो गए हैं, पहले नेता जनता के बीच सोते थे, अब जनता नेता के बंगले के बाहर सोती है। पहले नेता कहते थे मैं सेवक हूं अब विजिटिंग कार्ड पर छपता है। राजनीति सेवा नहीं, सबसे मुनाफे का बिजनेस बन गई। टिकट का रेट करोड़ों में। जीतने के बाद पांच साल में 100 करोड़ का। निवेश 10 करोड़, रिटर्न 1000 फीसद। शेयर बाजार भी शरमा जाए। हम तालियां बजाने वाले दर्शक। ’जागो भारत, जागो जनार्दन’ हे भारत के भाग्य विधाता, अब आंख खोलो। ’जाति का चश्मा उतारो जो नेता जाति पूछे, उससे काम पूछो। स्कूल कितने बनवाए? अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं? ’मुफ्त का मोह छोड़ो मुफ्त बिजली नहीं, 24 घंटे बिजली मांगो। मुफ्त राशन नहीं, रोजगार मांगों। भीख नहीं, हक मांगों। कुर्सी का मोह तोड़ो नेता को भगवान मत बनाओ। वो नौकर है, मालिक तुम हो। पांच साल बाद हिसाब मांगो, आरती मत उतारो। याद रखो ताज महल बनाने वाले मजदूरों का नाम इतिहास में नहीं है, पर ताज खड़ा है। देश बनाने वाले तुम हो, वोट देने वाले तुम हो। दुर्भाग्य तुम लिख रहे हो, और सौभाग्य भी तुम ही लिख सकते हो। जिस दिन जनता जाग गई, उस दिन सौदागरों की दुकान बंद हो जाएगी। क्योंकि लोकतंत्र में जनता मालिक है, मालिक सोता रहेगा तो नौकर राजा बन ही जाएगा।
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