बस्ती। चर्च की जमीन पर दुकानों का निर्माण करने की अनुमति को लेकर जो सवाल उठ रहे थे, कि ‘क्या डीएम ने निर्माण करने की अनुमति दी? उसका जबाव मिल गया हैं, डीएम ने ही दुकानों के निर्माण करने की अनुमति दी थी। भले ही चाहें वर्तमान डीएम ने नहीं दिया, लेकिन तत्कालीन डीएम ‘नरेंद्र सिंह पटेल’ ने अवष्य दिया। डीएम ने यह अनुमति ‘लाल एसोसिएट’ के पार्टनर निवासी प्लाट नंबर एफ-6 प्लास्टिक काम्पलेक्स शशांक लाल के आवेदन पर आज से दस साल पहले यानि 26 दिसंबर 16 को दी। यह अनुमति ‘अरुण डीन’ के दो जून 16 के पत्र के आधार पर दी गई, जिसमें इस मामले में किसी अन्य कार्रवाही की आवष्यकता नहीं’ बताई गई। कहा गया कि वर्तमान में ‘सेंट जेम्स चर्च’ के परिसर में सड़क की तरफ से चर्च की भूमि की सुरक्षा की दृष्टि से दुकानों का निर्माण ‘लखनउ डायोसेशन टस्ट एसोसिएषन’ के द्वारा कराया जा रहा है। डीएम ने लिखा कि चर्च के परिसर में निर्माण करने तथा मरम्मत आदि करने के लिए टस्ट पर कोई प्रतिबंध नहीं है। यानि टस्ट अगर चाहें तो दुकानों का निर्माण करवा सकता है। लेकिन टस्ट के द्वारा चर्च की संपत्ति की न तो विक्री कर सकता है, और न ही लीज, बंधक या पटटा ही कर सकता है। डीएम ने अपने आदेश में लिखा कि चर्च की भूमि की सुरक्षा एवं आर्थिक लाभ के लिए दुकानों का निर्माण करवाया जा सकता हैं, जिसमें कोई अवैधानिकता नहीं है। डीएम की ओर से एसडीएम की जांच रिपोर्ट पर सहमत होने के बाद निर्माण करने की अनुमति दी गई। इसी के आधार पर विषप ने 2026 में दुकानों का निर्माण करने की अनुमति दी, यह अलग बात हैं, कि पहले की तरह इस बार डीएम की अनुमति नहीं ली गई, और न चर्च की ओर से मानचित्र ही स्वीकृति करवाया गया। 2016 में भी बिना मानचित्र स्वीकृति के दुकानों का निर्माण करवा लिया गया था, डीएम ने अनुमति वाले आदेश में इसका जिक्र भी किया। तत्कालीन एसडीएम के छह मई 2016 की जांच रिपोर्ट में भी यह कहा गया है, कि कोई भी निर्माण बिना डीएम की अनुमति के नहीं किया जा सकता। उसके बाद ही दुकानों के निर्माण कराने की अनुमति डीएम से ली गई। चूंकि चर्च की जमीन नजूल की है, और नजूल के कस्टोडिएन डीएम होते हैं, इस लिए डीएम की अनुमति की आवष्यकता पड़ती है।
अब जरा आप लोग बस्ती के ‘सेंट जेम्स चर्च’ के इतिहास के बारे में जान लीजिए। आजादी के पहले फरवरी 1926 में तत्कालीन सरकार द्वारा ‘इंडिएन चर्च एक्ट अध्निियम’ पारित किया गया। यह एक्ट तत्कालीन भारत, पाकिस्तान, वर्मा एवं सिलोन के चर्च पर लागू था। ब्रिटिस सरकार के द्वारा संचालित सभी चर्च को ‘इंडिएन चर्च एक्ट’ के तहत लाया गया। चार फरवरी 1926 को जारी गजट में ‘सेंट जेम्स चर्च बस्ती’ जो ‘डायसेसि आफ लखनउ’ के अधीन आता था, में दिखाया गया। 23 मार्च 1948 को भारत सरकार ने एक राजाज्ञा जारी किया, जिसमें समस्त चर्च का स्वत्व एवं अधिपत्य, ‘इंडिएन चर्च टस्टीज’ को अन्तरित कर दिया, जिसमें ‘बस्ती का सेंट जेम्स चर्च’ भी षामिल है। यह भी कहा गया कि कैंटोमेंट एरिया को छोड़कर चर्च का सम्पूर्ण मालिकाना हक ‘इंडिएन चर्च टस्टीज’ को है। मुख्य सचिव ने 18 दिसंबर 1956 को लिखा कि प्रदेश में जितने भी सिविल चर्च हैं, उनका मालिकाना हक निर्विवाद रुप से ‘इंडिएन चर्च टस्टीज’ का है। चार फरवरी 1982 को इंडिएन चर्च टस्टीज के ‘चेयरमैन’ विषप आफ लखनउ के प़क्ष में पावर आफ एटार्नी कर दिया गया। इस पर विषप डायेसिस आफ लखनउ ने सेंट जेम्स चर्च बस्ती के संबध में सात सितंबर 1982 को एक पावर आफ एटार्नी ‘एचआर मल’ सचिव लखनउ डायोसेसिन टस्ट एसोसिएगषन के पक्ष में कर दिया।
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