बस्ती। जिस सीटीओ पर जिले भर के खजाने को संभालकर रखने का जिम्मा हो, अगर उसी सीटीओ पर गबन करने जैसा आरोप कोई लगाता है, तो बहुत ही गंभीर विषय है। इसे डीएम और इनके एफसी को संज्ञान में लेकर जांच करवानी चाहिए, और यह सुनिष्चित करना चाहिए, कि फिर कोई ठेकेदार सीटीओ पर गबन करने जैसा आरोप न लगा सके। दीपक कुमार मिश्र नामक जिस व्यक्ति ने लिखित में आरोप लगाते हुए इसकी जांच कराने की मांग की है, उनके पास इस बात के सारे साक्ष्य उपलब्ध है, कि सीटीओ साहब ने मां काली टेडर्स को विधुत का त्रुटिवष लगभग दो करोड़ का भुगतान ही नहीं किया, बल्कि गबन किया है, क्यों कि यह गबन की श्रेणी में आता है। कहा कि जिस फर्म के मामले में सीटीओ स्वंय जांच अधिकारी हैं, उस फर्म को भुगतान करना त्रुटि की श्रेणी में नहीं आता बल्कि गबन की श्रेणी में आता है। अगर सीटीओ साहब को इतनी सी बात समझ में नहीं आती तो फिर कोशागार का भगवान ही मालिक। इसी लिए शिकायतकर्त्ता ने सीटीओ के बारे में लिखा कि भले ही सीटीओ साहब अपने विभाग के प्रति ईमानदार न हो, लेकिन इन्हें स्वंय के प्रति ईमानदार होना चाहिए, ताकि यह कह सके कि अवसर मिला तो निष्पक्ष जांच किया। कहा कि आपने अधिकारियों को भ्रमित किया है।

29 अप्रैल 26 को सीटीओ के पत्र के जबाव में शिकायतकर्त्ता ने याद दिलाया कि पांच अगस्त 25 को डीएम को दिए गए शिकायती पत्र पर मेरे द्वारा व्यक्तिगत आपके कार्यालय में उपस्थित हुआ, और निविदा संबधी सारे साक्ष्य उपलब्ध कराया गया, उसके बाद भी आप लिख रहे हैं, कि मेरे द्वारा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं कराया गया। कहा कि उसके बाद भी आपके के द्वारा बिंदु संख्या छह, सात एवं आठ जो मां काली टेडर्स से संबधित हैं, उसका निस्तारण आज तक नहीं किया, सवाल किया कि बिना निस्तारण के कैसे आपने मां काली टेडर्स को इतनी बड़ी रकम का भुगतान कर दिया? भुगतान करने से पहले आपने यह भी नहीं देखा कि सीएमओ ने टेंडर का प्रकाषन ही नहीं किया, कहा कि जिसका प्रकाषन ही सीएमओ के द्वारा नहीं किया गया, उसका कैसे भुगतान हो गया? जबकि मेरे ही शिकायत पर सीडीओ और आपको जांच अधिकारी नामित किया गया। लिखा कि मेरे द्वारा छह सितंबर 25 को ही लिखित अवगत करा दिया गया, लेकिन आज तक आपने उसका निस्तारण नहीं किया, और कथित तरीके से सिविल कार्य का अन्य फर्मो को फर्जी भुगतान कर दिया गया। अब सवाल यह उठ रहा है, कि जिसका टेंडर ही प्रकाषन नहीं हुआ, उसके भुगतान का बिल कैसे प्रस्तुत हो गया, आखिर बिल किस आधार पर भुगतान करने के लिए सीटीओ के समक्ष प्रस्तुत किया गया, देखा जाए तो इसके लिए न सिर्फ सीटीओ बल्कि सीएमओ भी जिम्मेदार है। इस लिए इस विषय की भी जांच होनी चाहिए, कि कैसे सिविल कार्य का भुगतान बिना टेंडर के अन्य फर्मो को कर दिया गया, इससे पता चलता है, कि इस फर्जीवाड़े में फर्म से लेकर सीएमओ और सीटीओ तक की भूमिका संदिग्ध है। जिसकी जांच आवष्यक है।