बस्ती। भारतीय किसान यूनियन (भानु) के मंडल प्रवक्ता चंद्रेश प्रताप सिंह ने कहा कि देश की जनता श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल जैसी स्थिति नहीं चाहती, लेकिन केंद्र सरकार में बैठे कुछ लोग जानबूझकर ऐसा माहौल तैयार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि इस देश की जनता डरने वाली नहीं है। जितना उत्पीड़न किया जाएगा, उतनी ही बड़ी ज्वाला उठेगी। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में सरकारों ने संविधान को सुनना बंद कर दिया था, जनता ने संविधान पर भरोसा किया और सरकार ने कुर्सी पर, परिणाम स्वरूप सड़कों पर आग और अराजकता फैली। भारत का नागरिक आज भी सुबह उठकर संविधान, अदालत, चुनाव आयोग और संसद पर भरोसा करता है। किसान जानता है कि मशरूम को बोना नहीं पड़ता। जमीन में गोबर डालो, गर्मी और उमस पैदा करो, मशरूम खुद जमीन फोड़कर निकल आता है। केंद्र सरकार वही कर रही है। दिल्ली में छात्र, नौजवान, किसान, मजदूर कोई देश तोड़ने नहीं आया, वह संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अपनी बात कहने आया है। आंदोलन करना आज भी संवैधानिक और लोकतांत्रिक है। लेकिन सरकार उसी आंदोलन को दबा रही है, कुचल रही है। दिल्ली में जितनी तपन बढ़ाओगे, जमीन उतनी ही गरम होगी। गरम जमीन पर मशरूम ही फूटता है। आज एक को दबाओगे, दस निकलेंगे। एक विश्वविद्यालय बंद करोगे, दस मोहल्लों में पाठशाला खुलेगी। उन्होंने केंद्र सरकार पर देश की संपत्ति को पूंजीपतियों के हाथों बेचने का आरोप लगाते हुए कहा कि एयरपोर्ट, पोर्ट, रेलवे स्टेशन, खदान, बिजली, सड़क जो 70 साल में जनता ने खून-पसीने से बनाई, वह आज नीलाम हो रही है। ’उन्होंने दो टूक कहा अगर आंदोलन करना अलोकतांत्रिक है, तो देश बेचना महाअलोकतांत्रिक है।’ सवर्ण समाज के आंदोलन पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि छात्र, युवा, किसान का प्रोटेस्ट जितना जायज है, उतना ही सवर्ण समाज का आंदोलन भी जायज है। सरकार ने सवर्णों को छेड़कर बड़ी रार मोल ली है। सवर्ण समाज आज भी लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहा है, लेकिन दिल्ली उसे उकसा रही है। अगर राम, कृष्ण, राणा, परशुराम और भामाशाह के वंशज - हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, जैन सभी सवर्ण एक साथ ललकार पर आ गए, तो दिल्ली के पास उन्हें रोकने की ताकत नहीं है। कहा कि देश न मशरूम की खेती चाहता है, न नाबदान की राजनीति। देश चाहता है उसकी सुनी जाए। दिल्ली की सड़क पर बैठा नौजवान श्रीलंका नहीं बनाना चाहता।