बस्ती। कहना गलत नहीं होगा कि राजनीति में अब लोगों का मन इतना छोटा होता जा रहा है, कि अपनों की कामयाबी को भी नहीं पचा पा रहंे हैं। मन छोटा रखने वालों को बषीर बद्र के उस षेर को याद रखना चाहिए, जिन्होंने कहा कि ‘दुष्मनी जमकर करो, लेकिन इतनी गुंजाइष रहे कि जब कभी हम दोस्त हो जाए तो षर्मिदा न होना पड़े’। राजनीति में दुष्मनी और मित्रता हालात पर निर्भर करता है। ऐसे लोगों को यह ध्यान रखना चाहिए कि राजनीति में न कभी व्यक्तिगत मित्रता होती है, और न ही व्यक्तिगत दुष्मनी, अगर ऐसा होता तो आज ‘राजकिशोर सिंह और हरीष द्विवेदी’ एक साथ मंच पर न दिखते, अगर ऐसा होता तो ‘दयाशंकर मिश्र और रामप्रसाद चौधरी’ एक साथ भोजन और नाष्ता न करते, और अगर ऐसा होता तो ‘अरविंद सिंह और हरीष द्विवेद’ एवं ‘बब्बू सिंह और हरीश द्विवेदी’ एक ही दल के खेवनहार न बनते। लोगों को यह भी नहीं भूलना चाहिए, कि राजनीति बहुत ही निर्दयी और क्रूर होती है।

दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा, बस्ती की गुटबाजी को समाप्त नहीं कर पा रही है। इसी गुटबाजी के चलते भाजपा को चार विधायक और एक सांसद से हाथ धोना पड़ा, फिर भी भाजपाईयों की आंख नहीं खुल रही है। ऐसा भी नहीं कि पार्टी के हाईकमान को गुटबाजी का पता न हो, अगर पता है, तो फिर क्यों नहीं डैमेज को कंटोल करती? क्या पार्टी के लोग सफाया होने का इंतजार कर रहें है? गुटबाजी का नजारा एक बार फिर हाल ही में असम चुनाव के नतीजे के बाद देखने को मिला। वर्तमान जिलाध्यक्ष को छोड़कर शायद ही कोर कमेटी के किसी सदस्य ने असम की जीत का सेहरा असम प्रभारी एवं पूर्व सांसद हरीश द्विवेदी के सिर पर भी सजाया हो। व्यक्तिगत श्रेय देने के बारे में तो नहीं कहा जा सकता है, लेकिन सोशल मीडिया पर शायद ही किसी ने यह कहा हो कि इस जीत में असम प्रभारी की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। कोई मोदी को, तो कोई शाह को, तो कोई योगी को, तो कोई बंसलजी को जीत का हीरो बता रहें हैं। बेशक इन नेताओं का जीत में बहुत बड़ा हाथ है, लेकिन असम प्रभारी के योगदान को भी याद रखना चाहिए। कोई यह तक नहीं कह रहा और न लिख ही रहा है, कि अरे भाई इस जीत में हमारे बस्ती के पूर्व सांसद का भी योगदान है। यह कैसी राजनीति हैं, जो अपनों की जीत को अपने ही नहीं पचा पा रहे है। जो भाजपाई अपनों को बधाई तक नहीं दे सकते, पार्टी उनसे और क्या उम्मीद करेगी? यह बहुत बड़ा सवाल है, और इसी सवाल के जबाव में सबकुछ छिपा है। इस तरह के मौके पर नेताओं को कम से कम बड़कपन तो दिखाना ही चाहिए, भले ही अधूरे मन से ही सही, लेकिन दिखाना चाहिए, वरना अपनों और पराए के सामने षर्मिंदा होना पड़ेगा। कहने का मतलब भाजपा भले ही चाहें देष में जितनी भी मजबूत हो, लेकिन बस्ती में वह बिखरी और टूटी हुई नजर आ रही है, और इसके लिए पार्टी के आला कमान को जिम्मेदार माना जा रहा है। ऐसा लगता है, कि मानो नवागत प्रदेश अध्यक्ष ने भी बस्ती को भगवान के भरोसे छोड़ दिया, अगर ऐसा नहीं होता तो वह सबसे पहले बस्ती के भाजपाईयों के साथ बैठक करते, और गुटबाजी को समाप्त करने का प्रयास करते। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि क्या भाजपा इसी गुटबाजी के साथ 2027 के चुनाव में जाएगी?