बस्ती। डा. बृजेश शुक्ल प्रेम कहीं सीएमओ डा. राजीव निगम के लिए मुसीबत न खड़ी कर दें, जिस सीएमओ ने सारे नियम कानून तोड़ और सीएमओ से सीनियर डा. एके गुप्त को नजरअंदाज करके आरसीएच एवं सीएमएसडी जैसी मलाईदार पद दिया, उसका खामियाजा सीएमओ और डा. बृजेश शुक्ल को आज नहीं तो कल भुगतना पड़ सकता है, क्यों कि अब अब यह मामला सीएमओ और डीएम तक नहीं रह गया, अलबत्ता हाईकोर्ट पहुंच चुका है। डा. बृजेश शुक्ल को आज नहीं तो कल हटना ही पड़ेगा, हो सकता है, कि कहीं इसकी चपेट में सीएमओ आ जाए। अमूमन किसी डिप्टी सीएमओ स्तर या फिर किसी अन्य जूनियर की हिम्मत सीएमओ के भ्रष्टाचार के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की नहीं पड़ती। डा. एके गुप्त ने सीएमओ के उस आदेष को चैलेंज किया, जिसमें उनके स्थान पर एक जूनियर और स्थानीय डा. बृजेष षुक्ल को आरसीएच एवं सीएमएसडी का प्रभार दिया गया, षासनादेष में स्पष्ट लिखा है, कि किसी भी स्थानीय डाक्टर को तो जिले में तैनात किया जा सकता है, लेकिन उसे जिला स्तरीय पद का प्रभार नहीं दिया जा सकता। जब डा. एके गुप्त से यह पूछा गया कि डा. बृजेश शुक्ल में वह कौन सी ऐसी काबिलयत हैं, जो आप में नहीं हैं, और जिसके चलते सीएमओ ने नियम कानून को तोड़ दिया, कहने लगे कि यह तो सीएमओ की ही बता पाएगें, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सीएमओ ने डा. बृजेश शुक्ल को आरसीएच एवं सीएमएसडी का प्रभार देकर षासनादेष का उल्लघंन किया, जिसका जबाव उन्हें और षासन को कोर्ट में देना होगा। केस का निर्णय कब का हो गया होता, लेकिन नंबर नहीं आ रहा। बहरहाल, यह तो तय हो गया, कि सीएमओ ने क्यों सारे नियम कानून तोड़कर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारी। इसे लेकर सीएमआ,े शिकायतकर्त्ता उमेश गोस्वामी के निषाने पर भी है। इसकी जांच हो रही है। डा. बृजेश शुक्ल, एडी हेल्थ की जांच में तो पैसे के बल पर बच सकते हैं, लेकिन वह हाईकोर्ट से नहीं बच पाएगंे। सीएमओ और शासन के लिए हाईकोर्ट को यह बताना कठिन होगा कि क्यों नियम कानून को तोड़ा गया? जो षिकायतें मुख्यमंत्री स्तर पर की गई, और जिसकी जांच चल रही है, उसमें डा. बृजेष षुक्ल और सीएमओ दोनों को भ्रष्ट अधिकारी बताया गया, और कहा गया कि सीएमओ ने इस लिए नियम कानून को तोड़ा ताकि प्रभारी के साथ मिलकर एनएचएम के धन को लूटा जा सके, रिपोर्ट तो कंगालने की आ रही है। श्रीशुक्ल को लाने के पीछे मार्च में लूट पाट करना माना जा रहा है। कहा जाता है, कि जब तक कोर्ट का निर्णय आएगा, तब तक मार्च बीत जाएगा, यही मंशा सीएमओ और प्रभारी की भी है। क्यों कि इन दोनों को अच्छी तरह मालूम है, कि हाईकोर्ट उन्हें छोड़ेगा नहीं। अगर कोई सीएमओ से सीनियर डिप्टी सीएमओ रैंक का अधिकारी अपने ही सीएमअरो के खिलाफ कोर्ट जाता है, तो माना जाता है, कि सीएमओ ने गलत निर्णय लिया। इससे सरकार और सीएमओ दोनों की बदनामी हो रही है। चूंकि सीएमओ पर किसी भी आरोप का कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर इनके स्थान पर और कोई सीएमओ होता तो मामला हाईकोर्ट तक जाने ही नहीं देता, यही एक समझदार सीएमओ की निशानी होती है। डा. बृजेश शुक्ल भी अगर ईमानदार होते तो कभी भी वह अपने सीनियर का हक नहीं मारते, शुक्लजी के बारे में कहा जाता हैं, कि उनको अपनी नौकरी से अधिक गांधीजी प्रिय है। यह गांधीजी के लिए किसी भी हद तक जा सकते, सीनियर का हक भी यह मार सकते है। सीएमओ, डा. शुक्ल, डा. एसबी सिंह और डा. एके चौधरी, गांधीजी के लिए जिस रास्ते पर चल रहें, हैं, उसका खामियाजा एक न एक दिन भुगतना ही पड़ेगा, परिवार तक इसकी चपेट में आ सकता है।
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