बस्ती। जिस तरह मरीजों और उनके परिजन के जान को जोखिम में डालकर बेसमेंट में ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हो रहा, उसका सील होना अति आवष्यक हैं, वरना, ऐसी घटना घट सकती है, जिसकी भरपाई ओझाजी ने नहीं कर पाएगें। वैसे भी उस बेसमेंट में कोई भी डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित नहीं हो सकता और न उसे लाइसेंस ही दिया जा सकता है, जिसके जाने और आने का एक ही रास्ता होता। ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर का बखान करने वाले मीडिया को एक बार अवष्य जाकर देखना चाहिए, क्या ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर तारीफ के लायक है। यकीन मानिए, अगर किसी मीडिया ने उस बेसमेंट को देख लिया, जहां पर तिल रखने की जगह नहीं हैं, तो उनकी राय ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर के बारे में बदल जाएगी। आप लोग अंदाजा लगाइए कि अगर बेसमेंट में आगजनी जैसी कोई घटना हो जाएगी तो कैसे कोई वहां से निकलकर अपनी जान बचा पाएगा। चार-पांच फीट के आने-जाने रास्ते से क्या कोई निकल पाएगा? इसी लिए कहा जाता है, कि मीडिया को काफी सोचसमझकर किसी सेंटर या फिर नर्सिगं होम के बारे में राय बनानी चाहिए, वरना मीडिया पर अगुंली उठते देर नहीं लगेगी। जिले का सबसे अधिक पैसा कमाने वाले ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर को अगर मरीजों के सुरक्षा की कोई चिंता नहीं है, तो ऐसा पैसा कमाने से क्या फायदा जो किसी के जान को जोखिम में डालकर कमाया जाए। ओझाजी एक अच्छे इंसान, व्यक्ति और डाक्टर हो सकते हैं, लेकिन एक अच्छा संचालक नहीं हो सकते, यह उनके सेंटर को देखकर कहा जा रहा है।

बहरहाल, बिना जिम्मेदारों के रिपोर्ट देना को नहीं बात नहीं हैं, इससे पहले भी यह कई बार बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट दे चुके है। 18 जून 22 और 23 फरवरी 25 को भी यह बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट दे चुके है, जिसका साक्ष्य मरीजों ने मीडिया को उपलब्ध कराया। अगर इसके बाद भी इसके संचालक सफाई देते हैं, तो उनकी सफाई में कितना सच्चाई हैं, इसका फैसला खुद मरीज करें। ओझाजी आप मरीज से सौ-दो सौ रुपया अधिक ले लीजिए, लेकिन उनके जीवन के साथ खिलवाड़ मत कीजिए, वरना उपर वाला भी आपको माफ नहीं करेगा। रही बात सीएमओ की तो इसके नोडल डिप्टी सीएमओ डा. एके चौधरी को इससे कोई मतलब नहीं कि मरीज मरे या जिए, इन्हें तो सिर्फ गांधीजी से मतलब है। जिस दिन ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर में कोई घटना हो जाएगी, उस दिन सबसे पहले गाज सीएमओ और डिप्टी सीएमओ पर गिरेगी। अगर वाकई ओझा डायग्नोस्टिक सेंटर के संचालकों को मरीजों की चिंता है, तो सबसे पहले बेसमेंट से सेंटर को हटाना पड़ेगा, वरना किसी दिन बहुत बड़ी मुसीबत में पड़ सकते हैं, मरीज और सरकार एक बार बिना हस्ताक्षर के रिपोर्ट की तो अनदेखी कर सकती है, लेकिन घटना को नहीं।

इस सेंटर से जांचों की रिपोर्टें मरीजों को जो दी जा रही हैं, उनमें अधिकृत डॉक्टर के हस्ताक्षर नहीं हो रहें है। इसे मरीज की नहीं बल्कि संचालक की गलती मानी जाएगी। हाल ही में सामने आई एक 23 मार्च 2025 की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में डॉक्टर का हस्ताक्षर नहीं पाया गया। इतना ही नहीं, वर्ष 19 अगस्त 2022 की सीटी स्कैन रिपोर्ट में भी किसी रेडियोलॉजिस्ट का हस्ताक्षर नहीं मिला। किसी भी मेडिकल जांच की रिपोर्ट तभी वैध मानी जाती है जब उस पर संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर के हस्ताक्षर हों। लेकिन यहां कई मामलों में  नियमों को दरकिनार कर रिपोर्ट जारी कर दिए जाते है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सेंटर में मरीजों की भारी भीड़ रहती है और कई बार जल्दबाजी में रिपोर्ट तैयार कर दी जाती है। ऐसे में रिपोर्ट की सटीकता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बिना डॉक्टर के सत्यापन के रिपोर्ट जारी करना मरीजों के इलाज को गलत दिशा में ले जा सकता है, जिससे उनकी जान को खतरा तक हो सकता है। अब इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य विभाग से जांच कर कार्रवाई की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए तो मरीजों के जीवन के साथ बड़ा जोखिम बना रहेगा।