बस्ती। अगर मंडल मुख्यालय का कोतवाली, कोतवाल बिना दस दिन से सूना रहेगा, तो सवाल उठेगा ही। सवाल उठ रहा है, कि क्या एसपी साहब को एक अदद ऐसा ईमानदार कोतवाल नहीं मिल रहा जो कोतवाली को माडल बना सके, या फिर राजनेताओं की दखलअंदाजी के कारण कोतवाल की नियुक्ति नहीं हो पा रही है। जो बातंे छन के आ रही है, अगर उसे सच माना जाए तो इसके लिए उन भाजपा के दो नेताओं को जिम्मेदार माना जा रहा है, जिनके दखलंदाजी के कारण कोतवाली, कोतवाल के बिना इतने दिनों से सूना पड़ा है। कहा जा रहा है, कि यह दोनों अपने-अपने पसंद का कोतवाल बनाना चाह रहें हैं। ताकि कोतवाली पर कब्जा किया जा सके। वहीं पर यह बातें भी छन के आ रही है, कि एसपी साहब ऐसे को कोतवाल बनाना चाह रहे हैं, जो नेताओं की पसंद का न हो, क्यों कि अगर किसी नेता के पसंद का कोतवाल बन गया तो लोग एसपी साहब को कमजोर मानने लगेगें और दूसरा कोतवाली, कोतवाल की नहीं बल्कि नेताओं की इच्छा ओैर अनिच्छा पर चलने लगेगा। एसपी साहब कभी नहीं चाहेगें कि उनके कोतवाल को नेता अपना कोतवाल कहें। एसपी साहब को जानने वाले कहते हैं, कि एसपी साहब उन पुलिस अधिकारियों में से नहीं हैं, जो अपने कामकाज में नेताओं की दखलंदाजी बर्दास्त करें। शहर के लोग भी यही चाहते हैं, कि जो भी कोतवाल बने वह ईमानदार हो, और जिसे लोग एसपी साहब का कोतवाल कहें। मंडल मुख्यालय का कोतवाली होने के कारण, बड़े अधिकारियों की नजर भी रहती है। एक वर्ग ऐसा भी जो यह कह रहा है, कि कोतवाल चाहें जिसकी पसंद का हो, लेकिन ऐसा हो जो फरियादियों को सम्मान दें, और उनकी बातें सुने, जरुरी समझे तो मुकदमा दर्ज करे। जिस दिन ‘महिला/पुरुष’ कोतवाली में 12 बजे रात में बिना किसी डर के जाने लगेगा, और उसे सम्मान मिलेगा, उस दिन पुलिस और सरकार दोनों का मकसद हल हो जाएगा। यह पढ़ा लिखा वर्ग इस लिए यह बात कह रहा है, क्यों कि सालों हो गए, ऐसा कोई कोतवाल नहीं आया, जिसके तबादले पर शहर के लोगों ने विरोध जताया हो, या फिर उनके जाने पर आसूंओं से बिदाई की गई हो। कहना गलत नहीं होगा, कि कोतवाल में ही पूरे जिले की पुलिस की छवि देखी जाती है। पुलिस और सरकार की छवि बनाने और बिगाड़ने में कोतवाल साहब के कामकाज की अहम भूमिका होती है, और एसपी साहब कभी नहीं चाहेगें कि उनकी और सरकार की छवि खराब हो। बहरहाल, एसपी साहब को जो भी निर्णय लेना हो, लंे, लेकिन अब कोतवाली को और अधिक दिन तक कोतवाल के बिना सूना न रखे।