बस्ती। बस्ती के उप निदेशक कृषि, प्रदेश के पहले ऐसे अधिकारी होगें, जिनके पास पहले से ही किसानों के अनुदान को बेचने में डिग्री हासिल कर रखी है, लेकिन, अब यह फर्जी वेतन बेचने की भी डिग्री हासिल करना चाहते है। इसमें पहले की तरह इस बार भी इनका सहयोग इनके चहेते लिपिक कर रहें। इस विभाग में अभी तक अनुदान, खाद, बीज और मलाईदार पटल बेचते हुए तो सुना और देखा गया है, मगर, पहली बार फर्जी वेतन बेचते देखा और सुना जा रहा है। इन सबके लिए सहकारिता मंत्री की तरह कृषि मंत्री को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। कहा जा रहा है, कि जब तक इन दोनों के यहां ब्रीफकेश कल्चर रहेगा, तब तक न तो विभाग से भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है, और न अधिकारी और लिपिक लूटखसोट करना बंद करेगें। कहने को भले ही दोनों मंत्री अपने आपको योगी की तरह ईमान होने का एचएमवी रिकार्ड बजाते रहें, लेकिन किसान और जनता इन दोनों को भ्रष्ट मंत्रियों की श्रेणी में रखती है।
डीडी और बिल लिपिक के द्वारा फर्जी वेतन बेचने का खुलासा फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बर्खास्त हुई, लिपिक शचि वर्मा’ के वेतन भुगतान के मामले में हुआ। जिस तरह हाईकोर्ट की अवहेलना और बिना किसी सक्षम अधिकारी के आदेश के डीडी और बिल लिपिक जितेंद्र मिश्र ने बर्खास्तगी के दौरान का लगभग डेढ़ माह का वेतन का भुगतान किया, उससे दोनों की मुसिबतें बढ़ सकती है, और अगर कहीं इसे हाईकोर्ट और शासन ने संज्ञान में ले लिया तो डीडी और लिपिक के खिलाफ वित्तीय अनियमितता एवं हाईकोर्ट की अवहेलना के आरोप में विभागीय एवं विधिक कार्रवाई तक हो सकती है। इसमें सबसे अधिक नुकसान लिपिक का हो सकता है। ऐसा लगता है, कि मानो उप निदेशक कृषि और लिपिक को पैसे की कमी आ गई हो, वरना, कोई भी डीडी स्तर का अधिकारी और बाबू पैसे के लिए इतना बड़ा रिस्क नहीं उठाता। वैसे डीडी के फर्जी वेतन बेचने का मामला शासन तक पहुंच भी चुका है, बस कोर्ट तक पहुंचना बाकी है।
चूंकि इस विभाग के भ्रष्ट अधिकारियों और लिपिकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती और अगर होने वाली भी होती है, तो यह लोग अनैतिक तरीके से कमाए गए से भरा ब्रीफकेश मंत्री और बड़े साहबों तक पहुंचा देते हैं, यह लोग बचने के लिए राज नेताओं का सहारा भी लेते है। इस लिए इस विभाग में जितना भ्रष्टाचार बढ़ा, उतना अन्य किसी विभाग में नहीं बढ़ा होगा, जिस विभाग के साहब का ‘वाहन चालक’ खुदरा और थोक खाद और बीज के विक्रेताओं से वसूली के हिस्से से करोड़पति हो सकता है, तो ‘साहबों’ और ‘लिपिकों’ की कमाई का तो अन्दाजा ही नहीं लगाया जा सकता, जिन जिला कृषि अधिकारी, उप निदेशक कृषि और संयुक्त निदेशक कृषि के पास प्रति खाद की बोरी का 50 रुपया का बखरा पहुंचता हो, वे आर्थिक रुप से कितना मजबूत होगें, यह सोचने और विचार करने वाली बात उन लोगों के लिए हैं, जो लोग भ्रष्ट लोगों का बचाव करते है। कार्रवाई न होने से इन लोगों का मन इतना बढ़ गया, कि यह लोग फर्जी वेतन तक बेचने लगे। एक तरह से साहब और बाबू ने उन कर्मचारियों को खुला आफर दे रखा है, जो फर्जी वेतन खरीदने चाहतें है। कहा जाता है, कि अगर फर्जी वेतन लेना तो कार्यालय आ जाइए। कार्यालय आगर आप को सबसे पहले स्थापना सहायक, वाद सहायक एवं वेतन बिल लिपिक से मिलना होगा, और उन्हें बताना होगा कि कितने माह का फर्जी वेतन चाहिए, अगर किसी ने बाबू को पटा लिया तो समझो उसकी लाटरी निकल जाएगी, उसे बिना काम किए लाखों का वेतन मिल जाएगा।
बतादें कि 21 जुलाई 25 को डीडी की ओर से कूटरचित दस्तावेजों के सहारे नौकरी हथियाने वाली लिपिक शचि वर्मा को बर्खास्त कर दिया गया। इसके बाद यह बर्खास्तगी के विरोध में हाईकोर्ट चली गई, जहां से इन्हें 10 सितंबर 25 को राहत मिल गया, ध्यान देने वाली बात यह है, कि कोर्ट ने इन्हें यथावत रखने का स्टे दिया, न कि बर्खास्तगी के दौरान का वेतन का भुगतान करने का। खेल, यहां से शुरु हुआ, बिल लिपिक जितेंद्र मिश्र ने एक सितंबर 25 से वेतन भुगतान करने का बिल डीडी के पास ले कर गया, डीडी साहब ने त्वरित भुगतान वाले बिल पर हस्ताक्षर कर दिया, हस्ताक्षर करने से पहले यह नहीं देखा, कि जब कोर्ट के आदेश पर लिपिक शचि वर्मा ने 10 सितंबर 25 को ही ज्वाइन किया तो क्यों पहली सितंबर 25 से वेतन का भुगतान किया गया। दूसरा खेल, तब शुरु हुआ, जब मैडम, डीडी के पास गई और कहा कि साहब बर्खास्तगी के अवशेष दिनों का भी वेतन का भुगतान कर दिया जाए, फिर बाबू बुलाए, और 22 जुलाई से पहली सितंबर तक का वेतन भुगतान करने का बिल लाने को कहा। दूबारा भुगतान भी हो गया। इस तरह डीडी ओर लिपिक ने मिलकर लगभग डेढ़ माह फर्जी वेतन का भुगतान कर दिया। डेढ़ माह का वेतन कितने में बिका इस बात का पता नहीं चल सकता, लेकिन बिका अवष्य, क्यों कि बिना बखरा के डीडी और लिपिक कलम न चलाने वाले है। जब यह मामला कोर्ट और शासन में जाएगा तो डीडी से अवष्य पूछा जाएगा, कि जब कोर्ट ने वेतन भुगतान करने का कोई नही ंतो और न विभाग की ओर से कोई आदेश मिला तो आप ने कैसे भुगतान कर दिया? डीडी और लिपिक ने न सिर्फ वित्तीय अनियमितता किया, बल्कि बर्खास्तगी के दौरान का वेतन का भुगतान करके नियमित भी कर दिया।
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