बस्ती। बस्ती का जिला पंचायत, प्रदेश का शायद पहला ऐसा जिला पंचायत बन गया, जहां पर विदेश से बड़ी मात्रा में इंर्पोटेड इंटरलाकिगं मंगवाया गया, जिसका इस्तेमाल नवनिर्मित्त कार्यालय के भवन में करने की योजना है। कहने की बात नहीं कि इंर्पोटेड इंटरलाकिगं ईंट कितना मंहगा होगा, और उसके टांसपोर्ट पर कितना खर्च आया होगा, यह जांच का विषय है। सवाल उठ रहा है, कि विदेश से इंटरलाकिगं मंगाने की क्या अवष्यकता पड़ गई? जिसके लिए इतना धन खर्च करना पड़ा, क्या इंडिया में इंटरलाकिगं ईंट का निर्माण नहीं हो रहा? जो विदेष से मंगाने की जरुरत पड़ गई। हैरान करने वाली बात यह है, कि इसके बारे में एएमए को कोई जानकारी नहीं, पूछने पर पहले बताया कि जेई और ठेकेदार से पूछिए कि विदेशी इंटरलाकिगं ईंट क्यों खरीदा? कहां से खरीदा? एएमए के द्वारा जानकारी न देने के कारण यह पता नहीं चला कि एक इंटरलाकिगं ईंट की कीमत कितनी है, और यह कहां से मंगाया गया। जो जानकारी एक मिनट में दी जा सकती, उसके लिए आरटीआई के तहत मांगने को कहा गया। इससे पता चलता है, कि अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति कितना सजग और  जिम्मेदार हैं। इससे पहले भी इन्होंने यह कहते हुए जानकारी देने से मना कर दिया था, कि आरटीआई के तहत मांगिए। एएमए रोज उसी रास्ते से आते-जाते हैं, जहां पर विदेश से मंगाया गया ईटरलाकिगं ईट का चटटा लगा हुआ। इन्होंने या फिर एई और जेई ने यह पता करने का प्रयास नहीं किया कि यह इंर्पोटेड ईंट कहां से मंगाई गई। जिले के लोगों ने पहली बार विदेशी इंटरलाकिगं ईंट देखा। इसकी पैकिगं देख कर ही अंदाजा लग जाता है, कि यह ईंट विदेशी होगा। ईंट और पैकिगं दोनों कौतहल का विषय बना हुआ, हर कोई इसकी लागत और उस देश का नाम जानना चाहता है, जहां से इंर्पोटेड इंटरलाकिगं ईंटं मंगाया गया। कई लोग तो इस तरह र्की इंट को अपने आवास और प्रतिष्ठान में लगवाना भी चाहते है। लेकिन उन्हें जानकारी नहीं हो पा रही है, कि इसे कहां से खरीदा जाए।

लोगों ने पहली बार इर्स इंट को गिफट के पैक में देखा। जब इसकी जानकारी गूगल से ली गई तो पता चला कि इस ईंट के निर्माता नेपाल की ‘एसियन कंकरीटों’ नामक कंपनी है। ईंट के उपर जो गिफट का पैक लगाया गया, और जिसे फीते से बंाधा गया, उसके उपर ‘एसिएन कंकरीटों’ का रिबन लगा हुआ हैं, और उस रिबन पर कंपनी का मोबाइल नंबर $9779802711167 भी दिया गया, जो नेपाल देश का है। इस कंपनी के मानचित्र पर इसका कारोबार पूरा नेपाल दिखाया गया, इंडिया में कारोबार नहीं दिखाया गया। कंपनी का ‘लोगो’ भी वही है, जो गूगल पर और रिबन पर दिखाया गया। इससे पता चलता है, कि इंटरलाकिर्गं इंट नेपाल से मंगाया गया। एक तरफ मोदीजी अनावष्यक खर्चो पर रोक लगाने की अपील कर रहे हैं, और दूसरी तरफ जिला पंचायत विदेश से ईंट मंगा रहा है। ऐसा भी नहीं कि जिले में इस तरह की इंटरलाकिगं ईट का निर्माण नहीं होता, कोई भी ऐसा गांव नहीं जहां पर कुटीर उधोग के रुप में इंटरलाकिगं ईंट का निर्माण न होता हो। लेकिन जिला पंचायत के लोग तो मानों जिले के कुटीर उधोग को ही समाप्त करना चाहते है। लोग ऐसे मौके पर गिल्लम चौधरी जैसे अन्य जांबाज जिला पंचायत सदस्यों से सवाल कर रहें है, और पूछ रहें हैं, कि भाई आखिर आप लोग इस मामले में खामोश क्यों हैं? क्या खामोश रहने के लिए भी अन्य की तरह इस बार भी आप लोगों ने कोई समझौता किया? एक तरफ देश आर्थिक संकट से जूझ रहा है, और दूसरी तरफ जिला पंचायत विदेश से इंटरलाकिगं ईट मंगवा रहा है। मीडिया के प्रति एएमए का जो गैरजिम्मेदाराना रर्वैया है, उसके चलते और भी भ्रातियां उत्पन्न हो गई। इनका पत्रकारों को अपमानित करना और यह कहना कि हमने तो जागरण, हिंदुस्तान और अमर उजाला को कह दिया हैं, कि जो भी लिखना हो लिखो, मेरा कुछ नहीं होगा। इससे इनकी मीडिया के प्रति ईमानदारी का पता चलता है। बहरहाल, कुछ अधिकारियों को यह गलमफहमी रहती है, कि मीडिया उनका कुछ नहीं कर सकती। इसी गलतफहमी के षिकार बस्ती के एएमए भी है। ऐसा लगता है, कि इन्होंने मीडिया का सम्मान करना सीखा ही नहीं। रही बात जिला पंचायत अध्यक्ष की तो अगर यही ठीक होते तो किसी एएमए की हिम्मत मीडिया को अपमानित करने की न पड़ती। पूर्व के एएमए से जब भी कोई सवाल करो, तो वह गुस्सा नहीं होते थे, बल्कि एक गिलास पानी मंगवाते थे, और पिलाते थे।