बस्ती। बार-बार यह सवाल उठ रहा है, कि भाई वह कैडर वाले कहां गुम हो गए, जिन्होंने अपने खून-पसीने से पार्टी को षून्य से शिखर तक पहुंचाया। पार्टी ने ऐसे लोगों को क्यों किनारा कर दिया? जिनके रग-रग में भाजपाई बसा हुआ हैं, और जो आज भी पार्टी के लिए कुछ भी करने को तत्पर है। क्यों नहीं पार्टी ऐसे लोगों की सेवाएं ली जा रही है? जब कि इनमें भाजपा की डूबती नैया को पार लगाने की पूरी काबिलियत हैं। यह वही भाजपा के सच्चे सिपाही लोग हैं, जिन्होंने अपने त्याग, बलिदान और मेहनत से जिले में पांच-पांच विधायक और एक सांसद को जीताया। लेकिन जैसे ही इनके स्थान पर आयातित लोगों को पलकों पर बैठाना शुरु हुआ, वैसे ही चार विधायक और एक सांसद हार गए। उसके बाद भी पार्टी की आंख नहीं खुल रही है, ऐसा लगता कि मानो पार्टी की आंख तब खुलेगी, जब जिले से भाजपा का सफाया हो जाएगा। वैसे सफाया करने का इंतजाम हो भी चुका है। कहना गलत नहीं होगा कि आज जिन आयातित लोगों को पलकों पर बैठाया जा रहा है, उनका एक मात्र उद्वेष्य भाजपा के नाम पर अधिक से अधिक पैसा और नाम कमाना है। अगर पार्टी ऐसे लोगों से 2027 की नैया पार लगाने की आशा करती है, तो पार्टी की यह एक और बड़ी भूल होगी, जिन लोगों को पार्टी पद से नवाज रही हैं, और पलकों पर बैठा रही है। अगर उनमें एक दो को छोड़ दिया जाए तो अन्य लोगों में इतनी भी कूबत नहीं कि वे अपने गांव से भाजपा को जीता सके, या फिर इनके कहने पर 40-50 वोट भी भाजपा को मिल सके। इस सच को स्थानीय, क्षेत्रीय और प्रदेश के नेता भी अच्छी तरह जानते और समझते हैं, और इसका अनुभव भी इन लोगों को विधानसभा और लोकसभा के चुनाव में हो भी हो चुका है। उसके बाद भी कैडर के लोगों की उपेक्षा की जा रही है। यह तो खुद के पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसी बात होगी। यह एक गंभीर सवाल है, कि वे कौन लोग हैं, जो कैडर के लोेगों को किनारा करके ऐसे लोगों को पद से नवाज रहें और सम्मान दे रहें हैं, जो पार्टी के प्रति न तो कभी वफादर रहें हैं, और न इन्हें पार्टी के विचारधारा से ही कोई सरोकार रहा, तो फिर ऐसे लोगों को क्यों पलकों पर बैठाया जा रहा हैैं? और क्यों पार्टी के आन-बान और शान रहे कैडर के लोगों की उपेक्षा की जा रही है? अगर पार्टी, जिले के वर्तमान कैबिनेट के भरोसे 2027 फतह करने की सोच रही है, तो पार्टी को अपनी सोच को पार्टी हित में बदलना होगा, और ऐसे कैडर के लोगों की टीम खड़ी करनी होगी, जिस पर पार्टी पूरी तरह भरोसा कर सकें। इन्हीं भरोसे में एक नाम हैं, अभय पाल का। सारी योग्यता के बावजूद भी यह इस लिए जिलाध्यक्ष नहीं बन पाए, क्यों कि यह किसी के मनई-तनई नहीं बन सके। जिस कोर कमेटी के 10 में से आठ-नौ सदस्यों ने इनके नाम पर मोहर लगाया, और जिसे पूरा जिला जानता था, कि इस बार जिलाध्यक्षी का ताज अभय पाल के सिर पर ही सजेगा। लेकिन दिल्ली के एक फोन ने इनके सिर से ताज उतारकर एक ऐसे व्यक्ति के सिर पर सजा दिया, जो कार्यकर्त्ता की पहली पसंद तक नहीं रहे। जिसका नतीजा आज सबके सामने है। कहा भी जाता है, कि जब तक दिल्ली का फोन आता रहेगा, तब तक योग्य और कैडर लोगों की उपेक्षा होती रहेगी।

बहरहाल, सबसे पहले हम आप लोगों को भाजपा के उन ‘हीरा’ कहे जाने वाले कैडर के बारे में बताने जा रहा हैं, जिनके चलते आज भाजपा में कुछ लोग मलाई काट रहे है। यह ऐसे भाजपाई हैं, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी भाजपा के नाम कुर्बान कर दिया। भाजपा के प्रति इन लोगों का जूनून देखते बनता है। चाहते तो यह लोग भी अपनी निष्ठा बदल सकते थे, लेकिन नहीं। अगर किसी हीरा का नाम भूल से छूट गया हो तो वह माफ करेगें। रविंद्र गौतम, चंद्र शेखर मुन्ना, अरविंद गोला, पवन कसौधन, सुशील सिंह, राम चरन चौधरी, दिवाकर मिश्र, चंद्रभान गुप्त, चतुरगुन राजभर, गणेश नरायन मिश्र, राजेंद्र गौड़, चुनमुन लाल, नंद किशोर, श्याम मणि त्रिपाठी, विष्वदत्त शुक्ल, लालजी प्रसाद, शोभी सोनकर, अवधेश सिंह, मनमोहन श्रीवास्तव उर्फ काजू श्रीवास्तव सहित कई ऐसे संर्घषशील भाजपा कार्यकर्त्ता हैं, जिन्होंने भाजपा को शुन्य से शिखर तक पहुंचाया। अगर आज आप लोगों को इन्हें तलाषना हो तो बड़ी मुस्किल से इनका पता मिलेगा।

अब जरा आज की टीम को देख लीजिए, अंदाजा लग जाएगा, कि इन लोगों की और पार्टी के विचारधारा में कितना अंतर है। कोई मोदी, षाह और योगी का नारा लगाकर और भक्त बताकर भाजपाई नहीं बन सकता। भाजपाई बनने के लिए कैडर के लोगों जैसा त्याग और बलिदान करना होगा। जिस टीम में ब्रहृमदेव उर्फ देवा, अनिल दूबे, अरविंद पाल, पिंटू तिवारी, दिलीप पांडेय और अभिषेक कुमार और भोलू सिंह जैसे लोग रहेगें, तो समझ सकते कि भाजपा कहां जाएगी। भाजपा के प्रति इन लोगों की निष्ठा किसी से छिपी हुई नहीं रह गई। अनेक भाजपाई कहते भी हैं, कि अगर 2027 में कहीं सत्ता परिर्वतन हो गया तो इनमें में से न जाने कितनों को वाहन में झंडा बदलते देर नहीं लगेगा। दयाषंकर मिश्र आज भी कहते हैं, कि हमने पार्टी भाजपा की नीतियों के कारण नहीं बल्कि हरीश द्विवेदी के कारण छोड़ा। यह उस दयाशंकर मिश्र का दर्द हैं, जिन्होंने जिलाध्यक्ष रहते सिर्फ और सिर्फ हरीश द्विवेदी का नाम प्रत्याशी के रुप में भेजा था, और इन्हीं के कार्यकाल में सबसे अधिक वोटों से जीतें भी। अगर कोई व्यक्ति पार्टी छोड़ने का कारण बनता है, तो पार्टी को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।